आवारा कुत्तों के आतंक से, 02 वर्ष के मासूम की पड़ी खतरे में जिन्दगी  

आवारा कुत्तों के आतंक से, 02 वर्ष के मासूम की पड़ी खतरे में जिन्दगी

कुत्तों का आतंक या व्यवस्था में दोष ? काटने की घटना गिनते हैं,या वैक्सीन की संख्या?

#हरदोई
जनपद अब कुत्तों की कुत्तई कब तक भुगतेगा? क्या जिम्मेदार कुत्तों के काटने के मामले में इंतजार कर रहे हैं? आखिर कब तक ये जनपद आवारा कुत्तों के आतंक को झेलेगा? कुत्ताप्रेमी अलग नहीं मान रहे। ऐसे में शहर में कुत्तों के आतंक से निपटने का इलाज क्या है? आखिर इन आवारा कुत्तों का इलाज क्या है? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं..?

ताजा मामला कोतवाली देहात थाना क्षेत्र से एक बेहद दर्दनाक और रूह कंपा देने वाला सामने आया है,जिसने पूरे इलाके को दहशत में डाल दिया है। गांव मढ़िया में घर के बाहर खेल रहे दो वर्षीय मासूम पर आवारा कुत्तों के झुंड ने जानलेवा हमला कर दिया। यह हमला इतना अचानक था कि चंद पलों में घर का आंगन चीख-पुकार में बदल गया। जानकारी के मुताबिक,गांव निवासी प्रवीण बाजपेई का दो वर्षीय पुत्र अर्चित अपने घर के गेट पर मासूमियत से खेल रहा था। तभी अचानक चार-पांच खूंखार आवारा कुत्तों ने उसे घेर लिया और बुरी तरह नोचना शुरू कर दिया। कुत्ते बच्चे को खींचकर ले जाने लगे। मासूम की चीख सुनकर पास ही मौजूद उसकी चाची शोभा की नजर पड़ी, जिन्होंने जान की परवाह किए बिना शोर मचाया। और आवारा कुत्तों के झुंड से बचाया शोर सुनते ही आसपास के ग्रामीण दौड़ पड़े।ग्रामीणों को अपनी ओर आता देख कुत्ते मासूम को लहूलुहान हालत में छोड़कर भाग गए। परिजन तुरंत खून से लथपथ बच्चे को लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंचे,जहां उसे गंभीर हालत में भर्ती कर इलाज किया जा रहा है।डॉक्टरों के अनुसार मासूम की स्थिति नाजुक बनी हुई है, और वह जिंदगी व मौत के बीच संघर्ष कर रहा है।

घटना केवल एक खबर नहीं, बल्कि समाज और प्रशासन दोनों के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। आवारा कुत्तों के काटे का जनपद में शोर तो बहुत है,लेकिन इस समस्या के स्थायी निदान को लेकर ठोस काम सिर्फ कागज पर है। इन आवारा कुत्तों से निजात पाने के इंतजाम भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े हुए हैं।

आवारा कुत्तों के मामलों में मानवीय पहलुओं का तो नितांत ही अभाव है। इसकी मौत के तो इंतजाम सब तलाश रहे हैं, लेकिन वह इंसानों के बीच जी सके,इसके लिए कहीं कोई सोच ही नहीं। नतीजा ये है कि इंसान के इस सबसे पुराने व विश्वसनीय साथी की सांसों को प्रशासन के द्वारा नियम-कायदों के बीच बांधने के नाकाम इंतजाम किए जा रहे हैं। मूल समस्या के समाधान पर कहीं कोई चिंतन-मंथन दूर तक नहीं।