साबरमती लोको शेड की तकनीकी कामयाबी, डब्ल्यूडीजी-5 लोको में इलेक्ट्रिक स्टार्ट से अब सेकंडों में होगा इंजन शुरू

अहमदाबाद। पश्चिम रेलवे के साबरमती लोको शेड ने तकनीकी नवाचार और आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। शेड के इंजीनियरों ने 5500 हॉर्स पावर क्षमता वाले डब्ल्यूडीजी-5 श्रेणी के लोकोमोटिव में दो महत्वपूर्ण तकनीकी संशोधन सफलतापूर्वक किए हैं। इन नवाचारों से न केवल लोकोमोटिव की उपलब्धता और विश्वसनीयता बढ़ी है, बल्कि भारतीय रेल को 57.80 लाख रुपये से अधिक की अनुमानित बचत भी हुई है।

45-60 मिनट की जगह अब सिर्फ 3-4 सेकंड में स्टार्ट

साबरमती लोको शेड में उपलब्ध सभी सात डब्ल्यूडीजी-5 लोकोमोटिव में पहले न्यूमेटिक स्टार्ट सिस्टम लगा था। इसके चलते लोकोमोटिव को स्टार्ट करने में करीब 45 से 60 मिनट लग जाते थे। साथ ही इसके लिए महंगे आयातित उपकरणों की आवश्यकता होती थी।

शेड के इंजीनियरों ने इस समस्या का समाधान करते हुए न्यूमेटिक स्टार्ट सिस्टम को इलेक्ट्रिक स्टार्ट सिस्टम में परिवर्तित कर दिया। अब लोकोमोटिव को शुरू होने में केवल 3 से 4 सेकंड का समय लग रहा है।

इस संशोधन में डब्ल्यूडीजी-4 और डब्ल्यूडीपी-4 लोकोमोटिव में पहले से उपयोग किए जा रहे इलेक्ट्रिक स्टार्टिंग मोटर, संपर्कक, प्रतिरोधक और बैटरी जैसे आसानी से उपलब्ध घटकों का इस्तेमाल किया गया। इससे महंगे आयातित स्पेयर पार्ट्स पर निर्भरता भी कम हुई।

सामान की अनुपलब्धता के कारण लंबे समय से खड़े चार लोकोमोटिव में से दो को इलेक्ट्रिक स्टार्ट प्रणाली में परिवर्तित कर सफलतापूर्वक सेवा में वापस लाया जा चुका है। इस तकनीकी बदलाव से 20.61 लाख रुपये की बचत हुई है।

स्वदेशी तकनीक से लंबे समय से खड़े लोकोमोटिव को मिली नई जिंदगी

साबरमती लोको शेड ने डब्ल्यूडीजी-5 लोकोमोटिव के टर्बो-सुपरचार्जर और लेफ्ट-बैंक वाटर पंप को लेकर भी स्वदेशी समाधान तैयार किया है। विदेशी स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति में 2 से 3 वर्ष तक का लंबा समय लगने के कारण लोकोमोटिव संख्या 50003 लंबे समय से सेवा से बाहर था।

शेड के इंजीनियरों ने इन-हाउस तकनीकी संशोधन के माध्यम से डब्ल्यूडीजी-5 के टर्बो-सुपरचार्जर की जगह आवश्यक बदलाव के साथ डब्ल्यूडीजी-4 टर्बो-सुपरचार्जर और क्लच असेंबली तथा लेफ्ट-बैंक वाटर पंप की जगह डब्ल्यूडीजी-4 वाटर पंप सफलतापूर्वक लगाया।

संशोधन के बाद लोकोमोटिव संख्या 50003 का लोड परीक्षण किया गया, जिसमें सभी प्रमुख परिचालन मानक निर्धारित मानकों के अनुरूप पाए गए। डब्ल्यूडीजी-4 के कलपुर्जे बनारस लोकोमोटिव वर्क्स से आसानी से उपलब्ध होने के कारण भविष्य में रखरखाव भी अधिक सुविधाजनक होगा।

इस तकनीकी बदलाव से प्रति लोको लगभग 37.19 लाख रुपये की बचत हुई है।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मजबूत कदम

साबरमती लोको शेड के इन दोनों नवाचारों से कुल अनुमानित 57.80 लाख रुपये की बचत हुई है। इसके साथ ही लोकोमोटिव को तेजी से सेवा में लाने, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता बढ़ाने और विदेशी कलपुर्जों पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिली है।

साबरमती लोको शेड की यह तकनीकी पहल भारतीय रेल में आत्मनिर्भरता, नवाचार और संसाधनों के बेहतर उपयोग का उदाहरण बनकर सामने आई है। इससे लोकोमोटिव की कार्यक्षमता और विश्वसनीयता बढ़ने के साथ रेलवे के रखरखाव खर्च में भी कमी आई है।