कैलाश पर्वत पर चतुर्थ शुक्लध्यान करते हुए भगवान आदिनाथ को प्राप्त हुआ मोक्ष पद, देवों ने मनाया मोक्ष कल्याणक महा महोत्सव


विदिशा से शोभित जैन की रिपोर्ट

जैन महाविद्यालय परिसर में आयोजित छह दिवसीय श्री आदिनाथ जिनबिंब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के अंतिम दिवस भगवान भगवान आदिनाथ के मोक्ष कल्याणक का अत्यंत भव्य एवं भावपूर्ण आयोजन किया गया। प्रातः 6:45 बजे कैलाश पर्वत से भगवान के मोक्ष पद की प्राप्ति का दिव्य प्रसंग मंचन के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर चतुर्निकाय के देवों तथा श्रद्धालु भक्तों ने अयोध्या नगरी के स्वरूप में सजे भव्य पांडाल में जयकारों से वातावरण को गुंजायमान कर दिया।
प्रवक्ता अविनाश जैन ?विद्यावाणी? ने बताया कि मंच पर कैलाश पर्वत की आकर्षक एवं भव्य रचना की गई थी, जिसमें प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को चतुर्थ शुक्लध्यान में लीन दर्शाया गया। जैसे ही भगवान को मोक्ष पद की प्राप्ति हुई, उनका नश्वर शरीर कपूर के समान विलीन हो गया और केवल नख एवं केश शेष रह गए। इसके पश्चात अग्निकुमार देवों ने आकर अंतिम संस्कार की प्रक्रिया संपन्न की तथा हवन के साथ यह पावन आयोजन पूर्ण हुआ।
कार्यक्रम के पश्चात सभी प्रतिष्ठित एवं नवप्रतिष्ठित जिनबिंबों की भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में हाथी एवं रथ पर श्रीजी को विराजमान कर नगर भ्रमण कराया गया तथा उन्हें शीतलधाम स्थित नवीन जिनालय में विधिवत् विराजमान कराया गया। नवीन मंदिर में प्रमुख कलश सहित चार अन्य कलश तथा स्थायी ध्वजारोहण के पात्र चुने गये।इस अवसर पर निर्यापक मुनि मुनि श्री संभवसागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि जिस परम पद की प्राप्ति के लिए प्रभु ने अनेक भवों तक कठोर तपस्या और पुरुषार्थ किया, उसी सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर वे सदैव के लिए सिद्धशिला पर विराजमान हो गए। उन्होंने कहा कि ?मोक्ष कोई स्थान नहीं, बल्कि आत्मा की एक सिद्ध अवस्था है। यह आत्मा की आंतरिक परिणति है, जिसे प्राप्त करने के लिए जीवन को पवित्र बनाना आवश्यक है।?
मुनि श्री ने कहा कि वर्तमान युग में भले ही प्रत्यक्ष मोक्ष की प्राप्ति दुर्लभ हो, किंतु घबराने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मोक्ष का मार्ग कभी बंद नहीं होता। यदि मनुष्य संयम, साधना और आत्मचिंतन के साथ अपने जीवन को पवित्र बनाने का प्रयास करे, तो वह निश्चित ही एक दिन उस परम लक्ष्य तक पहुंच सकता है।
उन्होंने बताया कि यह पंचकल्याणक महामहोत्सव बर्रो वाले बड़े बाबा के नवीन मंदिर के निमित्त आयोजित किया गया। बर्रो वाले बाबा को नए मंदिर में विराजमान करना जितना सरल प्रतीत होता है, वास्तव में उतना नहीं था। यह समस्त कार्य परम पूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से संभव हुआ। उन्होंने कहा कि वर्तमान आचार्य आचार्य समयसागर महाराज की आज्ञा से वे यहां समवसरण मंदिर की चाबी रखने आए थे, किंतु इसी दौरान नए मंदिर में बर्रो वाले बाबा की प्रतिष्ठा एवं पंचकल्याणक महोत्सव जैसे विशाल आयोजन भी संपन्न हो गए।
मुनि श्री ने इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीम सागर एवं मुनि श्री संस्कार सागर महाराज के योगदान को विशेष रूप से उल्लेखनीय बताया। साथ ही प्रतिष्ठाचार्य विनय भैया एवं तरुण भैया द्वारा किए गए समर्पित प्रयासों की सराहना की। उन्होंने मंदिर निर्माण में सहयोग देने वाले सभी दानदाताओं तथा पंचकल्याणक महोत्सव में योगदान देने वाले प्रमुख पात्रों को विशेष आशीर्वाद प्रदान किया।
इसके साथ ही जैन महाविद्यालय परिसर उपलब्ध कराने के लिए महाविद्यालय प्रबंधन, सकल दिगंबर जैन समाज समिति, श्री शीतल विहार न्यास की टीम, भोजनशाला समिति, आवागमन एवं ट्रैफिक व्यवस्था संभालने वाली टीम, प्रशासनिक अधिकारियों, प्रचार-प्रसार में संलग्न मीडिया प्रतिनिधियों तथा विभिन्न समितियों के सभी प्रभारीजनों को भी मुनि श्री ने विशेष आशीर्वाद प्रदान किया।