नवसंवतसर के दिन मनेगा श्रीआशुधीर महाराज का 535 वाँ जन्मोत्सव 

श्रीबाँकेबिहारीजी लगाएंगे कंद - माखन व मीठे नींव की कोपलों का भोग

वृन्दावन। जगप्रसिद्ध श्रीबाँकेबिहारी मंदिर में 19 मार्च को नवसंवतसर के दिन श्रीआशुधीरजी महाराज का 535 वाँ जन्मोत्सव मनाया जाएगा। पर्व पर जन जन के आराध्य भगवान श्रीबाँकेबिहारीजी महाराज कंद (पीली मिश्री), माखन व मीठे नींव की कोमल कोपलों के विशेष भोग के साथ ऋतुफल तथा शुद्ध दूध व मेवा - मावा से बने दिव्य पदार्थों का भोग लगाएंगे।

ठाकुरजी के सेवायत इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी ने बताया कि चैत्र शुक्ला प्रतिपदा (एकम - पड़वा) के दिन हिंदू नूतन वर्षारम्भ की मंगलमयी वेला में रसिक सम्राट श्रीस्वामीहरिदासजी महाराज के पूज्य पिताजी एवं गुरुदेव श्रीआशुधीर सारस्वत महाराज का 535 वाँ जन्मोत्सव तथा नवसंवतसर महोत्सव परम्परागत आयोजनों के साथ मनाया जायेगा। उत्सवान्तर्गत सर्वप्रथम प्रातःकाल श्रीबाँकेबिहारीजी महाराज के मन्दिर में प्रायः समस्त गोस्वामी बन्धु गोलाकार स्वरूप में, पंडित जी को मध्य में विराजमान कर बैठ जाएंगे।

तदुपरान्त मंदिर के कुलपुरोहित नवीन सनातन वर्ष 2083 का सम्पूर्ण फलादेश सुनाकर क्रमानुसार समस्त राशियों का गुणदोष बाँचेंगे। उक्तावसर पर सेवायतों, यजमानों और प्रबन्ध कमेटी के द्वारा मिश्रजी का यथोचित सम्मान किया जाएगा। इसके बाद भगवान के श्रीचरणों में नववर्ष की वृतोत्सव पत्रिका समर्पित कर भक्तों को वितरित की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि नवसंवत्सर के शुभदिवस पर ही श्रीस्वामीहरिदासजी महाराज के पूज्यनीय पिता व गुरुवर श्रीआशुधीरजी महाराज का जन्म हुआ था। जिसके उपलक्ष में प्रतिवर्ष बड़े श्रद्धाभाव से उनका जन्मोत्सव मनाया जाता है। पर्व के तहत श्रीबाँकेबिहारी मंदिर एवं प्राचीन श्रीहरिदासपीठ मंदिर सहित श्रीहरिदासीय सम्प्रदाय से जुड़े अनेक स्थानों पर विविध प्रकार के मनमोहक आयोजन सम्पन्न होते हैं. इतिहासकार के अनुसार ईस्वी सन 1491 में संयुक्त भारतवर्ष के तत्कालीन पंजाब प्रांत स्थित मुल्तान जिला अंतर्गत उच्च ग्राम नामक गांव में नवसंवतसर के शुभदिन श्रीगजाधर सारस्वत महाराज एवं उनकी धर्मपत्नी मंसादेवी के सुपुत्र रूप में जन्मे श्रीआशुधीर महाराज का लालन - पालन मुल्तान शहर के लाहौरी दरबाजा इलाके के पंजाबी सराय स्थित आवास में हुआ था। अत्यंत चमत्कारिक व्यक्तित्व के धनी श्रीआशुधीरजी का शुभविवाह मुल्तान के फिरोरा ग्राम निवासी मंडलेस्वर सारस्वत की सुपुत्री गंगादेवीजी के साथ सम्पन्न हुआ था।

इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी के मुताबिक अपने पूर्वजों की साधनाभूमि ब्रजमण्डल प्रदेश से अत्यधिक लगाव के चलते वर्ष 1507 ईस्वी में आशुधीरजी सपरिवार ब्रजधाम के हरिगढ़ (आलीगढ़ अथवा कोल) जिले में खैर तहसील के निकटवर्ती गाँव में आकर एक खेड़े (टीले) पर निवास करने लगे। कुछ समय पश्चात उन्होंने ईस्वरीय दिव्यादेश पर यहाँ खैरेस्वर महादेव को प्रतिष्ठित किया और उनकी सेवापूजा में तल्लीन हो गए। इसी गाँव में उनके स्वामीहरिदास, गोस्वामी जगन्नाथ व साधक गोविन्द नामक तीन सुपुत्र हुए। वर्ष 1525 ईस्वी में स्वामीहरिदासजी के चमत्कार से इस क्षेत्र के शासक गुर्जर राजा का मृत पुत्र जीवित हो उठा था, जिसके उपरांत उक्त राजा ने आशुधीरजी को पाँच गाँव दान में प्रदान किए थे। कालांतर में उन्ही पाँच गाँवों में सम्मिलित हरिदासजी की जन्मस्थली वाले गाँव का नाम हरिदासपुर रख दिया गया. उन्होंने बताया कि आशुधीर महाराज, स्वामीहरिदास के पिता व गुरुदेव हैं। इसीलिए श्रीबाँकेबिहारी मंदिर में वार्षिक पर्वोत्सवों की शुरुआत श्रीआशुधीर जन्मोत्सव से ही होती है। पूर्व की भाँति इस बार भी नवसंवतसर (19 मार्च) के दिन श्रीआशुधीर महाराज का जन्मोत्सव परम्परागत स्वरूप में अत्यंत गरिमामय तरीके से मनाया जाएगा, जिसकी तैयारियां द्रुतगति से चल रहीं हैं।

इसलिए लगता है नवसंवतसर को मीठे नींव का भोग

सेवायत आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी बताते हैं कि नवसंवत्सर (नववर्ष) के समय मीठे नीम की पत्तियों (कढ़ी पत्ता) का सेवन स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है। यह पेट को स्वस्थ रखने, कीटाणुओं को नष्ट करने और मौसम बदलने के दौरान शरीर का विषहरण करने के लिए खाया जाता है। यह औषधीय गुणों से भरपूर है, जो तमाम बीमारियों से रक्षा करता है।

उन्होंने बताया कि मीठे नीम का सेवन शरीर में कीटाणुओं को नष्ट करने और पेट के स्वास्थ्य को सुधारने में भी मदद करता है। इसी के साथ औषधीय गुणों से भरपूर नीम के पत्ते और उनका अर्क पुरुषों और महिलाओं के लिए प्राकृतिक स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करते हैं। बदलते मौसम में होने वाली बीमारियों से बचने के लिए नीम का सेवन अवश्य किया जाता है। यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालने में मदद करता है।