यूजीसी जैसे कानूनों से देश किस ओर जा रहा है?

यूजीसी जैसे कानूनों से देश किस ओर जा रहा है?

यूसीसी छोड़ यूजीसी जैसे कानूनों को लाया जा रहा। शंकराचार्य की पदवी का मूल्य खोया जा रहा। ब्राह्मणों को शिखा पकड़ कर रौंदा जा रहा। फिर कौन से हिंदुओं का ढोल पीटा जा रहा। आखिर किस सनातन के झण्डे को बुना जा रहा। आरक्षण की आग तो पहले ही जल रही है, अब यूजीसी लाकर मिट्टी का तेल डाला जा रहा। एससी/एसटी एक्ट तो पहले ही क्या कम था,जो यूजीसी से युवाओं को अब और रौंदने का काम किया जा रहा। सालों से दलित, दलित ही रहा, पिछड़ा, पिछड़ा ही रहा। तो इस कानून को फिर क्यूं बढ़ाया जा रहा। #अलंकार_अग्निहोत्री सिटी मजिस्ट्रेट बरेली जैसे सत्य कहने वालों को हिटलर शाही कर दबाया जा रहा। चाहे फिर प्रशासनिक अधिकारी,आम जनता हो या आदिगुरु शंकराचार्य ही क्यों न हो सभी को लाइन से हटाया जा रहा।

जातिवाद को बढ़ावा दिया जा रहा। ये मेरा देश किस ओर जा रहा...। क्या यूजीसी जैसे कानून को लाना हमारी आने वाली के लिए घातक नहीं है। क्या समरसता की बातें करने वाले राजनीतिक विद्वानों ने फिर यूसीजी के फायदे क्यों नहीं गिनाए। क्या कुछ श्रेणी के लोगों के तुष्टीकरण के लिए अन्य समाज को गर्त में डालने जैसे कानून को लाना समरसता है। बातें तो यूसीसी की हो रही थी। फिर यूजीसी कहा से आ गया। क्या यही विकास की राजनीति है? हिन्दू एक होंगे तो नेक होंगे। हिन्दू बंटेंगे तो कटेंगे। के महज अब नारे मात्र रह गए। जात पात को बढ़ावा कौन दे रहा है। अरे बुद्धिमान राजनीतिक विद्वानों बताओ तो जरा अब हिन्दुओं को बांटने की राजनीति कौन कर रहा..???