श्रीनाथजी की पावन धरा पर 9 अगस्त को होगा कवि देवीलाल जोशी के काव्य-संग्रह "शुभम्-सौंदर्य" का भव्य विमोचन

संवाददाता - संतोष व्यास

डूंगरपुर। वागड़ अंचल के सुप्रसिद्ध शिक्षाविद्, साहित्यकार एवं सांस्कृतिक चिंतक कवि देवीलाल जोशी के नवीनतम एवं बहुचर्चित काव्य-संग्रह "शुभम्-सौंदर्य" का भव्य विमोचन आगामी 09 अगस्त को पुष्टि मार्ग की प्रधान पीठ, प्रभु श्रीनाथजी की पावन नगरी नाथद्वारा (राजसमंद) में आयोजित होने जा रहा है। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा चयनित इस विशिष्ट कृति के लोकार्पण समारोह में प्रदेश के कई मूर्धन्य साहित्यकार, शिक्षाविद, सांस्कृतिक चिंतक और प्रबुद्ध नागरिक शिरकत करेंगे।

उल्लेखनीय है कि डूंगरपुर जिले के पुनाली गाँव निवासी देवीलाल जोशी लंबे समय से शिक्षा-जगत, साहित्य-सृजन और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में समर्पित रहे हैं। वे होराइजन पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल के निदेशक एवं संचालक हैं। उनकी इस नवीनतम कृति 'शुभम्-सौंदर्य' को राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा चयन प्रक्रिया में विशेष पहचान मिली है, जिससे सम्पूर्ण वागड़ अंचल सहित प्रांतीय साहित्यिक हलकों में हर्ष की लहर है।

- 'सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्' और भारतीय दर्शन की सजीव अभिव्यक्ति

कवि देवीलाल जोशी ने बताया कि 'शुभम्-सौंदर्य' का शाब्दिक अर्थ कल्याणकारी, पवित्र और आनंददायक सौंदर्य है। भारतीय दर्शन और कला में सौंदर्य की व्याख्या ?सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्? के रूप में की गई है, जिसके अनुसार जो सत्य है, वही कल्याणकारी अथवा शुभ है और वही परम सौंदर्य है। जोशी का यह काव्य-संग्रह भी अपनी कविताओं के माध्यम से भारतीय दर्शन के इसी शाश्वत स्वरूप की व्याख्या करता प्रतीत होता है। जोशी ने अपने काव्य-संसार में जीवन के विविध रंगों, मानवीय संबंधों, सामाजिक चेतना, राष्ट्रधर्म, अध्यात्म, प्रेम, प्रकृति, दर्शन, सौंदर्य और संवेदना जैसे व्यापक विषयों को अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि और गहराई के साथ अभिव्यक्त किया है।

- जीवन-दर्शन, आत्ममंथन और यथार्थ

संग्रह में शामिल रचनाएँ जैसे ?ज़िंदगी बहाना है??, ?ज़िंदगी में ज़िंदगी मिले? और ?जीवन को अब समझें? में रचनाकार जीवन को केवल घटनाओं का क्रम नहीं मानते, बल्कि उसे आत्मबोध, अनुभूति और निरंतर सीखने की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। इन रचनाओं में जीवन-दर्शन और आत्ममंथन की गहराई के साथ-साथ जीवन के भोगे हुए यथार्थ के दर्शन भी होते हैं।

- संत परंपरा, लोकमंगल और राष्ट्रचेतना

भारतीय सांस्कृतिक चेतना और संत परंपरा से कवि का गहरा जुड़ाव ?लोक मंगल तुलसी?, ?कविवर तुलसीदास?, ?फक्कड़ निर्गुण कबीर पंथ?, ?गुरु-शिष्य आह्वान? और ?गुरु बिन ज्ञान नहीं? जैसी रचनाओं में साफ़ तौर पर झलकता है। इनके माध्यम से लेखक ने भारतीय ज्ञान परंपरा, लोकमंगल और गुरु की महिमा को नए संदर्भों में पिरोया है। यहाँ अध्यात्म केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन को स्पष्ट दिशा देने वाली जाग्रत चेतना बनकर उभरा है। साथ ही, राष्ट्र और भाषा के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी इसमें मुखर हुई है। ?विश्व पटल?हिंदी महके? जैसी रचना में हिंदी संपूर्ण भारत की पहचान, एकता और संस्कृति का मूल आधार बनकर उभरती है।

- 'शुभम् छन्द' की मौलिकता और साहित्यिक योगदान

इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी कविताएँ कवि देवीलाल जोशी की स्वनिर्मित एवं मौलिक अभिव्यक्ति-शैली 'शुभम् छन्द' में रची गई हैं, जो उनकी अद्भुत सृजनात्मक मौलिकता को उजागर करती हैं। लेखन के साथ-साथ जोशी ने श्रीमद्भगवद्गीता पर ज्ञानपरक पुस्तकों का सृजन, स्थानीय इतिहास व स्मारिकाओं का निर्माण तथा लगभग 100 से अधिक लोकगीत, गरबा एवं प्रेरक गीतों की रचना की है। इससे पूर्व उनकी पुस्तक 'शुभम् भवन्तु शुभम्' को भी व्यापक जन-सराहना प्राप्त हो चुकी है।

- नाथद्वारा में तैयारियाँ अंतिम चरण में

श्वेतवर्णा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस कृति के लोकार्पण समारोह को लेकर नाथद्वारा एवं वागड़ क्षेत्र के साहित्य प्रेमियों में खासा उत्साह है। 9 अगस्त को आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में प्रदेशभर के साहित्य अनुरागी प्रभु श्रीनाथजी के दर्शन के साथ-साथ इस साहित्यिक उत्सव के साक्षी बनेंगे।