* गुरु पूर्णिमा पर हर वर्ग पहुँचा आशीर्वाद हेतु : राजेश्वरानंद *


दिल्ली 29 जुलाई:~ ग्रन्थ पढ़ने से शाब्दिक ज्ञान लेकिन गुरु पढ़ने से आत्मज्ञान निश्चित यह संदेश दिया गया स्वामी राजेश्वरानंद जी महाराज द्वारा गोरख पार्क शाहदरा स्थित श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर में गुरु पूर्णिमा महोत्सव पर शिष्यों को।
सदगुरु राजदरबार के प्रबंधक राम वोहरा ने बताया कि सर्वप्रथम स्वामी श्री राजेश्वरानंद जी महाराज के सान्निध्य में गुरु दरबार की संस्थापिका सदगुरु श्री श्री 108 राजमाता जी महाराज के चरण पादुका, श्री विग्रह एवं मंदिर गर्भगृह स्थित समाधि पूजन आरती गुरु माता पूजा जी के साथ सैकड़ों शिष्यों द्वारा हज़ारों दीपकों से किया गया।तत्पश्चात व्यास गादी पर विराजमान स्वामी राजेश्वरानंद जी महाराज की कलाई पर रक्षासूत्र, मस्तक पर तिलक एवं चरण प्रक्षालन के साथ पूजन का निरंतर जारी रहा। दिल्ली के अलावा उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि राज्यों से शिष्यों ने गुरु पूर्णिमा पूजन लाभ प्राप्त किया।भोर से शाम तक भजन,पूजा,भंडारे का सिलसिला चलता रहा।
इस पावन अवसर पर शिष्यों को आशीर्वचन देते हुए स्वामी श्री राजेश्वरानंद जी महाराज ने कहा कि "सिर्फ ग्रन्थ पढ़ने से शाब्दिक ज्ञान अक्सर अहंकार में फंसा देते हैं लेकिन गुरुदेव से मात्र शाब्दिक ज्ञान नही बल्कि साक्षात् गुरु को पढ़ने से आत्मज्ञान पार उतार देता है।क्योंकि गुरु साक्षात महाग्रंथ है।उनके पास जाकर उनके आचरण को पढ़िए।यानी सबसे पहले तो यह देखने ओर समझने में आता है कि
गुरुदेव की कथनी और करनी में कोई भेद नहीं समानता है यानी गुरुदेव से यह शिक्षा प्राप्त होती हैं कि किसी बात को भी कथनी से पहले कर्मों में उतारते हैं।गुरुदेव को पढ़ने से मुख्य शिक्षा प्राप्त होती हैं कि गुरुदेव अपने परिवार या समाज में कैसे रहते है!यानी कीचड़ में कमल की भांति। ऊपर से दिखाई देता हैं कि गुरुदेव क्रोध,लोभ आदि कर्म कर रहे हैं लेकिन उनके आचरण स्वभाव से स्पष्ट दिखाई देता हैं कि उनके कर्म ही कर्मयोग के मार्ग पर जाने की प्रेरणा दे रहे है।
स्वामी राजेश्वरानंद जी ने कहा सबसे मुख्य बात यह देखने में आती हैं कि विपरीत परिस्थितियों में गुरुदेव की सहजता, स्वीकार ओर साक्षी भाव कैसे बना रहता है।जोकि शिष्य को ज्ञान देता हैं शुभ अशुभ समय में हर्ष विषाद से बचकर सहज रहिए क्योंकि अंततः तो सुख हो या दुःख सब निकल ही जाना है।
अतः गुरु आचरण रूपी महाग्रंथ सैकड़ों ग्रंथों पर भारी साबित होते है।
ग्रंथों से प्राप्त शाब्दिक ज्ञान हो सकता हैं अहंकार में फंसा देगा लेकिन गुरु को पढ़ने से जो आत्मिक ज्ञान प्राप्त होगा जो पार उतार देगा।
राम वोहरा 9212315006