उत्तर मध्य रेलवे की नई पहल: सौर ऊर्जा से चलने वाला पैसेंजर कोच तैयार, हर साल होगी लाखों रुपये की बचत

प्रयागराज। उत्तर मध्य रेलवे ने हरित ऊर्जा और टिकाऊ रेल परिवहन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सोलर-असिस्टेड (सौर ऊर्जा संचालित) पैसेंजर कोच तैयार कर उसे सफलतापूर्वक कमीशन कर दिया है। यह अभिनव परियोजना 14 जुलाई 2026 से पायलट आधार पर शुरू की गई है। उत्तर मध्य रेलवे के महाप्रबंधक नरेश पाल सिंह की परिकल्पना और प्रयागराज मंडल के सफल क्रियान्वयन से यह उपलब्धि हासिल हुई है।

पारंपरिक आईसीएफ कोचों में बिजली की आपूर्ति पहियों से जुड़े एक्सल-ड्रिवन अल्टरनेटर के माध्यम से होती है, लेकिन नए सोलर-असिस्टेड कोच की छत पर 6.93 किलोवाट पीक क्षमता का अत्याधुनिक सोलर फोटोवोल्टिक सिस्टम लगाया गया है, जो सीधे सूर्य की रोशनी से स्वच्छ बिजली उत्पन्न कर बैटरी बैंक को चार्ज करता है।

रेलवे के अनुसार, इस नई तकनीक से पारंपरिक बिजली उत्पादन प्रणाली पर निर्भरता कम होगी, ऊर्जा की बचत होगी, बैटरी की आयु बढ़ेगी और रखरखाव का खर्च भी घटेगा। साथ ही यात्रियों को पंखे, लाइट और मोबाइल चार्जिंग जैसी सुविधाओं के लिए अधिक विश्वसनीय बिजली आपूर्ति मिलेगी।

आंकड़ों के मुताबिक, यह सोलर सिस्टम प्रति वर्ष लगभग 13,400 यूनिट (kWh) स्वच्छ बिजली का उत्पादन करेगा, जिससे प्रति कोच करीब 2.80 लाख रुपये की बचत होगी। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी यह पहल अहम साबित होगी, क्योंकि इससे हर वर्ष लगभग 11 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आएगी।

वर्तमान में इस तकनीक का सफल परीक्षण एक आईसीएफ नॉन-एसी पैसेंजर कोच पर किया जा रहा है। रेलवे अगले एक माह तक इसके प्रदर्शन की निगरानी करेगा। इसके बाद रेलवे कारखाने में हर महीने दो कोचों में यह सौर ऊर्जा प्रणाली लगाने की योजना है। पायलट परियोजना की सफलता के आधार पर भविष्य में इस तकनीक का विस्तार अन्य पैसेंजर कोचों में भी किया जाएगा।

उत्तर मध्य रेलवे की यह पहल भारतीय रेल के हरित ऊर्जा मिशन, तकनीकी नवाचार और ऊर्जा दक्षता की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। इससे न केवल रेलवे की परिचालन लागत कम होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ परिवहन को भी नई मजबूती मिलेगी।