छायादार पेड़ काटे पौधे भी नहीं लगाए आखिर कैसा पर्यावरण दिवस


छायादार पेड़ काटे, पौधे भी नहीं लगाए! आखिर कैसा पर्यावरण दिवस

एक दिन पहले पेड़ कटे, दूसरे दिन हुआ वृक्षारोपण?गढ़ाया लत्तीपुर में उठे बड़े सवाल

फोटो सेशन या पर्यावरण संरक्षण? जमीन पर पड़े मिले दर्जनों पौधे

100 पौधे लगाने का दावा, लेकिन मौके पर दिखी लापरवाही की तस्वीर

पुराने पेड़ गायब, नए पौधे बेहाल?जिम्मेदार कौन?

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विश्व पर्यावरण दिवस पर बड़े-बड़े दावे, पौधारोपण के कार्यक्रम और पर्यावरण संरक्षण की शपथें तो आपने बहुत देखी होंगी। लेकिन मथुरा के फराह विकासखंड अंतर्गत ऋषि गर्गाचार्य धाम आश्रम, गढ़ाया लत्तीपुर से सामने आई तस्वीरें कई गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। सवाल यह है कि क्या पर्यावरण दिवस केवल फोटो और औपचारिकताओं तक सीमित होकर रह गया है

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर गढ़ाया लत्तीपुर स्थित ऋषि गर्गाचार्य धाम आश्रम परिसर में जिला विकास अधिकारी गरिमा खरे सहित कई अधिकारियों और ग्रामीणों की मौजूदगी में वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

कार्यक्रम में यमुना स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और पौधारोपण को लेकर बड़े-बड़े संदेश दिए गए। लगभग 100 पौधे लगाने का दावा किया गया। लोगों ने पर्यावरण संरक्षण की शपथ भी ली।

लेकिन कार्यक्रम के अगले ही दिन जब हमारी टीम मौके पर पहुंची तो तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयां करती नजर आईं।

मौके पर कई पौधे जमीन पर पड़े मिले। कुछ पौधे अभी तक गड्ढों में नहीं लगाए गए थे। कई स्थानों पर खुदे हुए गड्ढे तो दिखाई दिए, लेकिन उनमें पौधे नहीं लगे थे। कुछ पौधे पॉलीबैग सहित जमीन पर पड़े दिखाई दिए।

अब सवाल यह है कि जिन पौधों को पर्यावरण बचाने के नाम पर लाया गया था, उनका आखिर क्या कसूर है? यदि उन्हें रोपा ही नहीं जाना था तो उन्हें यहां क्यों लाया गया?

सबसे बड़ा सवाल उस स्थान को लेकर भी उठ रहा है जहां वृक्षारोपण किया गया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इसी क्षेत्र में पहले से मौजूद छायादार और विकसित पेड़ों को काटा गया था।

यदि यह सच है तो सवाल और गंभीर हो जाता है।

क्या पुराने और विकसित पेड़ों को हटाकर नए पौधे लगाने को ही पर्यावरण संरक्षण कहा जाएगा?

यदि पेड़ों की कटाई हुई है तो किसकी अनुमति से हुई?

कटाई किसने करवाई?

और आखिर इसकी आवश्यकता क्या थी?

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब स्थानीय लोग और पर्यावरण प्रेमी जानना चाहते हैं।

वृक्षारोपण केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होता। किसी भी पौधे को पेड़ बनने में वर्षों लगते हैं। उसके लिए नियमित पानी, सुरक्षा और देखभाल की आवश्यकता होती है।

लेकिन मौके की स्थिति देखकर यह भी सवाल उठ रहा है कि इन पौधों की जिम्मेदारी आखिर किसे सौंपी गई है?

क्या किसी विभाग को इसकी निगरानी दी गई है?

क्या किसी कर्मचारी या संस्था को पौधों की सिंचाई का दायित्व दिया गया है?

क्या इनके लिए पानी की व्यवस्था की गई है?

या फिर कार्यक्रम समाप्त होने के साथ ही जिम्मेदारी भी समाप्त हो गई?

क्योंकि यदि पौधों को समय पर पानी नहीं मिला तो भीषण गर्मी में उनका जीवित रह पाना मुश्किल होगा।

स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल पौधे लगा देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें बचाना भी उतना ही आवश्यक है।

आज देशभर में करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन उनमें से बड़ी संख्या उचित देखभाल के अभाव में कुछ ही महीनों में नष्ट हो जाती है।

ऐसे में पर्यावरण दिवस के नाम पर होने वाले अभियानों की सफलता का वास्तविक पैमाना केवल पौधे लगाना नहीं बल्कि उन्हें जीवित रखना होना चाहिए।

अब लोगों की मांग है कि संबंधित प्रशासन और विभाग यह स्पष्ट करे कि इस स्थल पर पुराने पेड़ों की स्थिति क्या थी, यदि कटाई हुई है तो किसके आदेश पर हुई, और लगाए गए पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी किसे दी गई है।

फिलहाल तस्वीरें कई सवाल खड़े कर रही हैं और जवाब का इंतजार