भगत सिंह को याद करना ही काफी नहीं, उनके सिद्धांतों पर अमल भी करना होगा

23 मार्च भारत के इतिहास का वह दिन है जब महान क्रांतिकारियों राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह को अंग्रेजी सरकार ने लाहौर की केंद्रीय जेल में फांसी पर लटका दिया था। यह केवल तीन व्यक्तियों की शहादत नहीं थी, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐसे विचार और संघर्ष की प्रतीक घटना थी जिसने आने वाली पीढ़ियों को गहराई से प्रभावित किया। लगभग एक सदी बीत जाने के बाद भी भगत सिंह का नाम देश के युवाओं, विद्यार्थियों और मेहनतकश लोगों के बीच उतनी ही श्रद्धा और प्रेरणा के साथ लिया जाता है।

उस समय अंग्रेजी साम्राज्यवाद दुनिया की सबसे शक्तिशाली ताकतों में से एक था। कहा जाता था कि उसके साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता। उसने इंग्लैंड की भौगोलिक सीमा से कई गुना अधिक क्षेत्र पर शासन स्थापित कर रखा था और पूंजीवादी नीतियों के माध्यम से दुनिया भर के लोगों का शोषण जारी था। भारत भी उसी साम्राज्यवादी व्यवस्था का हिस्सा था, जहाँ आर्थिक लूट, राजनीतिक दमन और सामाजिक असमानता व्यापक रूप से मौजूद थी।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर भी उस समय दो प्रकार की धाराएँ स्पष्ट दिखाई देती थीं। एक धारा उन नेताओं की थी जो अंग्रेजों से कुछ राजनीतिक अधिकार प्राप्त कर सत्ता का हस्तांतरण भारतीय पूंजीपतियों और उच्च वर्गों के हाथों में देखना चाहते थे। दूसरी धारा भगत सिंह और उनके साथियों की थी। उनका उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन था। वे मानते थे कि यदि अंग्रेजों की जगह केवल भारतीय शासक आ जाएँ लेकिन शोषणकारी व्यवस्था वही बनी रहे, तो आम जनता की स्थिति में कोई वास्तविक बदलाव नहीं आएगा।

इसी विचार के आधार पर उन्होंने युवाओं को संगठित करने के लिए नौजवान भारत सभा जैसे संगठनों का निर्माण किया और एक ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें मेहनतकश जनता की सत्ता स्थापित हो तथा समाजवादी व्यवस्था के माध्यम से समानता और न्याय सुनिश्चित किया जा सके।

यदि हम भगत सिंह के जीवन और विचारों का अध्ययन करें तो स्पष्ट होता है कि वे केवल साहसी क्रांतिकारी ही नहीं बल्कि गहरे चिंतक और दार्शनिक भी थे। कम आयु के बावजूद उन्होंने व्यापक अध्ययन किया और अपने विचारों को लगातार विकसित किया। वे ऐतिहासिक घटनाओं और सामाजिक समस्याओं को भावनाओं के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करते थे।

उनकी रचनाओं में ?मैं नास्तिक क्यों हूँ?, ?विद्यार्थी और राजनीति?, ?अछूत का सवाल?, ?सांप्रदायिक दंगे क्यों होते हैं?, ?ड्रीमलैंड की भूमिका?, ?क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसविदा? तथा उनकी जेल डायरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन रचनाओं के माध्यम से उन्होंने एक ऐसा वैचारिक साहित्य प्रस्तुत किया जो आज भी समाज की समस्याओं को समझने और उनके समाधान की दिशा खोजने में मदद करता है।

भगत सिंह का मानना था कि गरीबी, बेरोजगारी, जाति-पाति, सांप्रदायिकता और सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं का मूल कारण शोषण पर आधारित आर्थिक व्यवस्था है। उनका स्पष्ट कहना था कि यदि स्वतंत्रता के बाद भी वही आर्थिक व्यवस्था कायम रहती है तो केवल शासकों का रंग बदल जाएगा, लेकिन आम जनता की स्थिति में कोई वास्तविक सुधार नहीं होगा। इसलिए वे केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन को भी उतना ही आवश्यक मानते थे।

आज जब हम वर्तमान परिस्थितियों को देखते हैं तो यह महसूस होता है कि भगत सिंह के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक असमानता और श्रमिकों के अधिकारों पर बढ़ते हमले यह संकेत देते हैं कि आर्थिक व्यवस्था गहरे संकट से गुजर रही है। उत्पादन के साधनों और संसाधनों पर कुछ लोगों का नियंत्रण लगातार बढ़ता जा रहा है, जबकि बड़ी आबादी रोजगार और जीवन की बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है।

भगत सिंह ने लगभग सौ वर्ष पहले ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किया था?काम के दिन को आवश्यकता के अनुसार सीमित किया जाना चाहिए। उनका मानना था कि तकनीकी प्रगति और उत्पादन क्षमता में वृद्धि का लाभ समाज के सभी लोगों को मिलना चाहिए। यदि कार्यदिवस को कम किया जाए और काम का अवसर अधिक लोगों को मिले, तो बेरोजगारी कम की जा सकती है और लोगों को बेहतर जीवन मिल सकता है।

आज भी कई क्षेत्रों में 8 घंटे के स्थान पर 10 से 12 घंटे तक काम करवाया जा रहा है और काम का दबाव लगातार बढ़ रहा है। इससे एक ओर कुछ लोगों के हाथों में पूंजी का अत्यधिक संचय हो रहा है, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार बने हुए हैं। ऐसे में कार्यदिवस को सीमित करने और रोजगार के अवसरों को व्यापक बनाने जैसे विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

भगत सिंह का विश्वास युवाओं और विद्यार्थियों की शक्ति पर था। वे चाहते थे कि विद्यार्थी केवल परीक्षाओं तक सीमित न रहें, बल्कि समाज और राजनीति की समस्याओं को समझें और उनके समाधान के लिए सक्रिय भूमिका निभाएँ। उनका मानना था कि जो राजनीति हमारे जीवन को प्रभावित करती है, उससे दूर रहना संभव नहीं है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भगत सिंह को केवल माल्यार्पण, सभाओं और नारों तक सीमित न रखें। उनके विचारों का गंभीर अध्ययन करें और समाज में समानता, न्याय और मानवता पर आधारित व्यवस्था के निर्माण के लिए प्रयास करें।

वास्तव में भगत सिंह को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन और सामाजिक संघर्षों में उतारें। केवल उनकी शहादत को याद करना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनके सिद्धांतों पर अमल करना ही उनके प्रति सच्चा सम्मान है।