जनजाति लोकनृत्य की प्राचीन विरासत: आधुनिकता के बीच पहचान बचाने की जद्दोजहद” “जब मांदर बजता है तो बोल उठती है संस्कृति: विलुप्ति के कगार पर खड़े नृत्यों को बचाने की कोशिश”


डॉ अभिषेक बेनर्जी नारायणपुर:-घने जंगलों, पहाड़ों और प्रकृति की गोद में बसे अबूझमाड़ में जब मांडर की थाप गूंजती है तो केवल कदम ही नहीं थिरकते, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति जीवंत हो उठती है। बस्तर और अबूझमाड़ के आदिवासी समाज में लोकनृत्य केवल कला प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और सामुदायिक एकता का प्रतीक हैं।आज जब आधुनिकता का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है और नई पीढ़ी शहरों की ओर आकर्षित हो रही है, तब भी आदिवासी समाज अपनी मौलिक पहचान को बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहा है। घोटुल की परंपरा से लेकर विवाह, मड़ई-मेला, फसल कटाई और धार्मिक अनुष्ठानों तक इन लोकनृत्यों की गूंज सुनाई देती है,अब इन लोक नृत्य के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता है

कोकरेंग नृत्य: पीढ़ियों की विरासत, अब संकट में
आदिवासी समाज का सबसे प्राचीन और दुर्लभ नृत्य कोकरेंग माना जाता है। यह नृत्य दादी-पुरखों के समय से चला आ रहा है और अब धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच रहा है।इसमें पुरुष अपनी कमर पर कांसे के बड़े घुंघरू बांधते हैं, जबकि महिलाएँ पैरों में घुंघरू पहनती हैं। सभी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर धीमी गति से विशेष लोकगीत गाते हुए नृत्य करते हैं। बीच-बीच में घुंघरुओं की झंकार और सामूहिक स्वर इस नृत्य को अनूठी पहचान देते हैं। यह मुख्य रूप से विवाह या विशेष धार्मिक आयोजनों में किया जाता है।

तुडुबुडी नृत्य: मिट्टी के वाद्य की लय
तुडुबुडी नृत्य का नाम ?तुडुबुडी? नामक वाद्य यंत्र से पड़ा है। यह मिट्टी के छोटे घड़े पर जानवर की खाल चढ़ाकर बनाया जाता है।नर्तक इसे कमर में बांधकर छोटे डंडे से बजाते हुए तेज और जोशीले अंदाज में नृत्य करते हैं। यह नृत्य विशेष रूप से घोटुल में युवाओं द्वारा किया जाता है और इसमें उत्साह और ऊर्जा की झलक दिखाई देती है।

मांदरी नृत्य: अबूझमाड़ �की सांस्कृतिक धड़कन
मांदरी नृत्य अबूझमाड़ समेत �बस्तर का सबसे लोकप्रिय लोकनृत्य माना जाता है। इसमें मांडर वाद्य यंत्र की थाप पर युवक-युवतियाँ गोल घेरा बनाकर तालबद्ध तरीके से नृत्य करते हैं,दीपावली, मड़ई-मेला और फसल कटाई जैसे अवसरों पर यह नृत्य विशेष रूप से किया जाता है। घुंघरुओं की झंकार और मांडर की गूंज इस नृत्य को जीवंत बना देती है।

गेड़ी (घोड़ी) नृत्य: संतुलन और रोमांच का अद्भुत संगम
बांस की लंबी लकड़ियों पर संतुलन बनाकर किया जाने वाला गेड़ी नृत्य बेहद रोमांचक और पारंपरिक नृत्य है। इसे घोड़ी नृत्य भी कहा जाता है।सावन महीने में मनाए जाने वाले हरेली त्योहार के दौरान यह नृत्य प्रमुख रूप से किया जाता है। नर्तक बांस के डंडों पर खड़े होकर गोल घूमते हैं और कई बार अद्भुत करतब भी दिखाते हैं।

रीलो नृत्य: गीत और प्रेम की मधुर लय
बस्तर अंचल का एक बेहद मधुर सामूहिक लोकनृत्य रीलो है। इसे मुख्य रूप से मुरिया और माड़िया जनजातियों द्वारा किया जाता है।युवक-युवतियाँ एक-दूसरे के कंधे या कमर पर हाथ रखकर गोल घेरा बनाते हैं और ?रीलो-रीलो? की गूंज के साथ गीत गाते हुए नृत्य करते हैं। धीरे-धीरे गीत और नृत्य की गति बढ़ती है और पूरा वातावरण उत्साह से भर उठता है।

गौर मार नृत्य: जंगल की शक्ति का प्रतीक
दुनिया भर में प्रसिद्ध गौर मार नृत्य को ?बाइसन हॉर्न डांस? के नाम से भी जाना जाता है। इसका नाम ?गौर? अर्थात भारतीय बाइसन से पड़ा है।नर्तक बाइसन के सींगों से बने मुकुट पहनते हैं और उन्हें कौड़ी तथा मोर पंख से सजाया जाता है। इस नृत्य में जंगल के जानवरों की चाल-ढाल की नकल करते हुए शक्ति और सौंदर्य का प्रदर्शन किया जाता है।

अबूझमाड़ की अन्य पारंपरिक नृत्य परंपराएँ
अबूझमाड़ क्षेत्र में इसके अलावा भी कई पारंपरिक नृत्य प्रचलित हैं, जैसे ?

ककसाड़ नृत्य ?अबूझमाड़ और बस्तर अंचल में प्रचलित ककसाड़ नृत्य मुख्य रूप से युवा आदिवासियों द्वारा किया जाने वाला पारंपरिक सामूहिक नृत्य है। मांडर और लोकगीतों की थाप पर युवक-युवतियाँ कतार या घेरा बनाकर नृत्य करते हैं, जो प्रेम, उत्साह और सामुदायिक एकता का प्रतीक माना जाता है।

मुरिया टीमकी नृत्य ? मुरिया जनजाति का यह पारंपरिक नृत्य ?टीमकी? नामक छोटे ढोल जैसे वाद्य यंत्र की थाप पर किया जाता है। मांदर और टीमकी की लय पर नर्तक दल समूह में तालबद्ध कदमों से नृत्य करते हुए अपनी समृद्ध घोटुल संस्कृति और लोक परंपरा को प्रदर्शित करते हैं।

दंडारी नृत्य ? धार्मिक पर्व और देव आराधना से जुड़ा नृत्य

परब नृत्य ? प्रकृति और फसल उत्सव का प्रतीक

हुलकी नृत्य ? शिकार और वीरता से जुड़ी परंपरा

इन नृत्यों में प्रकृति, जंगल और सामुदायिक जीवन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।

केवल कला नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आत्मा,इनके संरक्षण व संवर्धन �की जरूरत

�आदिम परम्परा के शोधकर्ता, इन विषयों के जानकार नारायणपुर के युवा लेखक डॉ अभिषेक बेनर्जी का मानना है कि अगर इन पारंपरिक नृत्यों को संरक्षित करने के लिए प्रयास नहीं किए गए तो कई दुर्लभ नृत्य धीरे-धीरे समाप्त हो सकते हैं।सांस्कृतिक महोत्सव, दस्तावेजीकरण और युवाओं को प्रशिक्षण देने जैसे कदम इन परंपराओं को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।मांदर की थाप, घुंघरुओं की झंकार और सामूहिक गीतों की गूंज के बीच बस्तर और अबूझमाड़ के ये लोकनृत्य केवल कला नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आत्मा हैं।घोटुल से लेकर मड़ई-मेला तक हर अवसर पर गूंजती यह लय बताती है कि आधुनिकता के दौर में भी आदिवासी समाज अपनी मौलिक पहचान को बचाने के लिए दृढ़ता से खड़ा है।