भगवान श्रीराम के आदर्शों को आत्मसात करें युवा : प्रो राजेश श्रीवास्तव

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बुविवि में दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू

झांसी। अंतर्राष्ट्रीय रामायण केंद्र भोपाल के निदेशक प्रोफेसर राजेश श्रीवास्तव ने कहा कि बुंदेलखंड वो भूमि जहां प्रभु श्रीराम वर्षों व्यतीत किए। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे भगवान श्रीराम के आदर्शों को आत्मसात करें। उनके चरित्र से प्रेरणा लें।

उन्होंने उक्त उद्गार सोमवार को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के गांधी सभागार में बुंदेलखंड के साहित्य,समाज और संस्कृति में श्रीराम विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में व्यक्त किए।

श्रीवास्तव ने कहा कि जर्मनी में सबसे ज्यादा शोध भगवान श्रीराम पर हुए। योरोप के तमाम देशों में उन पर शोध हुए। उन्होंने राधेश्याम द्वारा लिखित रामायण का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मुंशी अजमेरी ने रामलीला के मंचन के लिए बहुत सुंदर स्क्रिप्ट लिखी है। श्रीवास्तव ने गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं में भगवान श्रीराम और जानकी के चरित्र और व्यवहार की विशिष्टताओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वैवाहिक संस्कार की परंपरा बुंदेलखंड से ही प्रेरित है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम ने हर क्षेत्र को समेटकर कृतार्थ किया है।

राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो मुकेश पाण्डेय ने कहा कि भगवान श्रीराम साहित्य, समाज और संस्कृति के लिए आदर्श पात्र हैं। श्रीराम के बगैर कोई साहित्य पूर्णता को नहीं प्राप्त करता है। भगवान श्रीराम के नाम के स्मरण से ही विशेष ऊर्जा का संचार होता है। भगवान श्रीराम का चरित्र समाज के हर वर्ग के लिए महत्वपूर्ण हैं??। सुशासन, नीति, न्याय, त्याग, करूणा और समता सभी मोर्चों पर भगवान श्रीराम आदर्श हैं। बिना बुंदेलखंड का जिक्र किए हम भगवान श्रीराम के चरित्र का वर्णन नहीं कर सकते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस संगोष्ठी में प्रस्तुत साहित्य के माध्यम से समाज को नई दिशा प्रदान करेगी।

बीज वक्तव्य डा विद्या सागर उपाध्याय ने दिया। उन्होंने कहा कि हर युवा में भगवान श्रीराम के गुणों का समावेश हो तो जगत का कल्याण हो जाएगा। उन्होंने वंदेमातरम और बुंदेलखंड के महत्व को भी रेखांकित किया। दुनिया की पहली कविता की रचना बुंदेलखंड में हुई।

नार्वे से आए सारस्वत अतिथि डा शरद आलोक ने कहा कि हमारे राम अहिंसा भाव वाले हैं। उन्होंने भगवान श्रीराम के बारे में पुस्तकें लिखने वालों को याद किया। उन्होंने धरा पर तुम रहो, ये गगन हमारा है कविता भी पेश की।

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की संपादक डा अमिता दुबे ने कहा कि भगवान श्रीराम और सीता दोनों ने बुंदेलखंड में तपस्वी की तरह जीवन व्यतीत किया। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड के कण कण में श्रीराम दिखाई देते हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश हिंदी के कार्यों और गतिविधियों के बारे में जानकारी दी।

बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक राज बहादुर ने कहा कि भगवान श्रीराम के चरित्र और व्यक्तित्व को साहित्य साधकों ने रेखांकित किया है। हर घर में रामायण की उपस्थिति श्रीराम की महिमा को रेखांकित करती है। बुंदेलखंड में श्रीरामचरित मानस और उसकी प्रस्तुतियों पर बहुत काम हुआ है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम समाज की प्रेरणा के अनुपम स्रोत हैं। हम उनके आदर्शों को आत्मसात कर व्यक्तित्व को निखार सकते हैं।

राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक डा पुनीत बिसारिया ने सभी अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। साथ ही संगोष्ठी की विशिष्टताओं का उल्लेख करते हुए उसकी रूपरेखा प्रस्तुत की।�

इस कार्यक्रम में प्रो मुन्ना तिवारी, डा श्रीहरि त्रिपाठी, संगोष्ठी के आयोजन समिति के सचिव डा नवीन पटेल, डा विपिन प्रसाद, डा सुनीता वर्मा, डा सुधा दीक्षित, डा प्रेमलता, डा मुहम्मद नईम, जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान के समन्वयक डा कौशल त्रिपाठी, उमेश शुक्ल, डा राघवेंद्र दीक्षित, डा अभिषेक कुमार,डा जय सिंह, शोधार्थी देवेंद्र सिंह,अतीत विजय समेत अनेक विभागों के शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित रहे। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, पीएम उषा मेरू, कला संकाय,बुंदेली विरासत दीर्घा और महिला अध्ययन केंद्र बीयू के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों के हिंदी साधक, विचारक और साहित्यकार उपस्थित रहे। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र का संचालन डा अचला पाण्डेय ने किया।

कोंच की रामलीला का भी मंचन�

उद्घाटन सत्र में ही कोंच की रामलीला का मंचन संजय सिंघाल ने किया। उन्होंने रावण की भूमिका निभाकर

सबकी वाहवाही बटोरी।

प्रथम तकनीकी सत्र में पूर्व आईएएस अधिकारी प्रमोद कुमार अग्रवाल ने ?मुखिया मुख सो चाहिए खानपान को एक? का उदाहरण देते हुए कहा कि मुखिया का भाव सबके साथ समता का होना चाहिए। उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने मानस के विविध प्रसंगों के माध्यम से कर्मयोग पर बल दिया है। अंतर्राष्ट्रीय रामायण केंद्र, भोपाल की डा अर्पिता घोष ने श्रीराम के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को अनुकरणीय बताया।
प्रो धीरेंद्र प्रताप श्रीवास्तव ने कहा कि राम बुंदेलखंड के खेतों, महलों और विद्यार्थियों के हृदय में भी हैं। ओरछा का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां श्रीराम राजा के रूप में पूजे जाते हैं। श्रीराम ने सिखाया कि सत्ता जनसेवा का माध्यम है।
मुख्य अतिथि सागर की डा शरद सिंह ने सभी आयोजकों को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि श्रीराम का स्मरण करना ईश्वर से साक्षात्कार ही है। भगवान का दर्शन कहीं भी हो सकता है, बस भाव होना चाहिए। डा अजय शुक्ल ने भगवान श्रीराम के व्यक्तित्व के विविध पहलुओं का उल्लेख किया।
डा वंदना ने साहित्य,समाज और संस्कृति में श्रीराम के महत्व को रेखांकित किया। डा ज्योति उपाध्याय ने शोध पत्र के माध्यम से कोंच की रामलीला की विशिष्टताओं की जानकारी दी।�
इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए डा बीएस परमार ने कहा कि बुंदेलखंड की विशेषताओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि श्रीराम लोकजीवन में रचे बसे हैं। श्रीराम की चेतना के बगैर कोई भी कार्य संभव नहीं है। उन्होंने ईशुरी के राम को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आम जन को श्रीराम से समस्याओं से संघर्ष करने की ताकत मिलती है। इस सत्र का संचालन डा श्रीहरि त्रिपाठी ने किया। डा विपिन प्रसाद ने आभार व्यक्त किया। इस सत्र में पत्रकारिता विभाग के शिक्षक उमेश शुक्ल, डा राघवेंद्र दीक्षित, हिंदी विभाग की डा अचला पाण्डेय, संगोष्ठी आयोजन समिति के अध्यक्ष डा पुनीत बिसारियाआयोजन समिति के सचिव डा नवीन पटेल, समाजकार्य विभाग के डा मुहम्मद नईम, प्रख्यात रंगकर्मी आरिफ शहडोली समेत अनेक लोग उपस्थित रहे।