प्राण के अधिष्ठायक देव हैं भैरव- जगद्गुरू वसंत विजयानंद गिरी महाराज – शनि की जन्म प्रसंग सुनकर भावविभोर हुए श्रद्धालू – पाली में धर्म महामहोत्सव में भीड़ के सारे रिकॉर्ड टूटे – रविवार को ऐतिह

प्राण के अधिष्ठायक देव हैं भैरव- जगद्गुरू वसंत विजयानंद गिरी महाराज

? शनि की जन्म प्रसंग सुनकर भावविभोर हुए श्रद्धालू

? पाली में धर्म महामहोत्सव में भीड़ के सारे रिकॉर्ड टूटे

? रविवार को ऐतिहासिक कलश यात्रा

पाली। अखिल ब्रह्मांड में 33 कोटि देवताओं में केवल भैरव ही हैं जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हैं। प्राण के अधिष्ठायक देव हैं भैरव। भयरहित करणम इति भैरवं। अर्थात भय को हरने वाले भैरव हैं। यह बात कृष्णगिरी पीठाधीश्वर जगद्गुरू वसंत विजयानंद गिरी महाराज ने सातवें दिन विशाल जनमेदिनी को भैरव कथा श्रवण कराते हुए कही। पाली में किसी धर्मोत्सव में इतनी जबरदस्त भीड़ पहली बार देखी गई।

जगद्गुरू देव ने प्रसंग में कहा सूर्यदेव का विवाह उषादेवी से हुआ। उषा देवी को सूरजदेव का ताप असहनीय लगता। कहती जाती कि पिता ने विवाह तो करवा दिया अब आज्ञा की अवहेलना भी नहीं कर सकती और पतिव्रता धर्म भी नहीं छोडूंगी। उषादेवी ने एक रास्ता निकाला। वह स्वयं शीतल पहाड़ों में तपस्या करने चली गई और अपनी ही प्रतिकृति को सूर्यदेव की सेवा में छोड़ गई। वह उषा की तुलना में थोड़ी सांवली थी, जिसका नाम छाया पड़ा। छाया को एक पुत्र हुआ जो मातृ स्वभाव के कारण अन्य की तुलना में कमजोर और मंदबुद्धि था। सभी उसे मंदबुद्धि कहकर चिढ़ाते थे। मां छाया को यह देख अत्यधिक पीड़ा होती। मां का ममत्व हिलौरे ले रहा था। उसने ठानी कि अपने पुत्र को सर्वश्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न, सुयोग्य बनाएगी। लेकिन इसके लिए योग्य गुरू का होना आवश्यक था। देवी ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि प्रभु मेरे पुत्र के लिए ऐसा योग्य गुरू सुझाइए जो पुत्र को ऐसा बना दे कि तीनों लोकों में उसकी बराबरी कोई न कर सके, उसके कोप से तीनों लोक कांपे और उसके प्रसन्न होने पर जग का कल्याण हो। तब ब्रह्मा ने कहा सबको तज और भैरव को भज। देवी को पुत्र के लिए केवल गुरू की तलाश में 30 हजार वर्ष लगे। जब छाया भैरव मंडल पहुंची तो आंखें खुली की खुली रह गई। सूर्य लोक से 1 करोड़ 60 लाख गुना बड़ा भैरव मंडल। सभी वलय में देवी देवता सेवा और रक्षा में खड़े हैं। महाभैरव की रक्षा अष्टभैरव कर रहे हैं। स्वयं यमराज भी भैरव सेवा में लीन हैं। यानि प्राण हरता और प्राणदाता भी हैं भैरव। यम उनकी इच्छा के बिना आगे नहीं बढ़ते। भैरव से भेंट करने के लिए देवी को 7 हजार वर्ष इंतजार करना पड़ा। वह क्षण आया तो देवी ने भैरव देव से प्रार्थना की, प्रभु मेरे पुत्र को केवल आपके सिवाय कोई सर्व ज्ञान निपुण नहीं बना सकता, प्रभु उसे अपनी शरण में ले लो। भैरव जितने उग्र होते हैं उतने सरल भी हैं। देवी को भैरव देव ने तुरंत ही तथास्तु का आशीर्वाद दे दिया। ममत्व से भरी मां ने अपने मन को शांत कर अपने पुत्र को भैरव देव को सौंप दिया। भैरव देव ने समस्त कलाओं, विद्याओं, विधाओं में निपुण करने के साथ ही छाया पुत्र को सर्वगुण संपन्न भी बनाया। यह बालक भैरव का एकमात्र शिष्य हुआ। जिसे निपुण होने में 40 लाख वर्ष लगे। भैरव ने अपने शिष्य की माता को बुलावा भेजा कि अब वे अपने पुत्र को ले जासकती हैं। छाया देवी प्रकट हुई। लेकिन शिष्य ने अपने गुरूदेव भैरव के सम्मुख गुरुदक्षिणा भेंट करने की अनुमति मांगी। लेकिन शिष्य के पास देने को कुछ न था। शिष्य ने तत्काल अपनी तलवार से स्वयं के सिर को काटकर धड़ से अलग कर दिया और भैरव देव के चरणों मे गुरुदक्षिणा के रूप में समर्पित हो गया। यह देख मां वेदना से कराह उठी। भैरव ने तत्क्षण आशीर्वाद दिया, दिव्य ज्योति प्रकट हुई और शिष्य के प्राण लौट आये। भैरव देव ने कहा शिष्य ने स्वयं की बलि देकर मुझे प्रसन्न किया। अंतरिक्ष मे 8 गृह भ्रमण कर रहे हैं नौवां गृह मेरा शिष्य शनि होगा। शनि को वरदान दिया ब्रह्मांड को कंपा देने वाला और कामना करने वालों पर भरपूर कृपा बरसाने वाला होगा। प्रभु भैरव ने शनि से वचन लिया कि तिल के तेल का दीपक स्वीकार करोगे, जब भी कोई भैरव नाम का जप करेगा वह शनि के कोप से सदा मुक्त होगा।

कथा के बीच कर्णप्रिय भजनों पर भक्त खूब झूमे।

*जगद्गुरू देव ने गुरुदक्षिणा में आई राशि रोटी बैंक को समर्पित की?*

कथा के बीच कृष्णगिरी पीठाधीश्वर जगद्गुरू वसंत विजयानंद गिरि महाराज ने पांडाल में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं को विधि विधान अनुसार गुरू दीक्षा दी। इस अवसर पर जगद्गुरू ने घोषणा की कि गुरुदक्षिणा में वे किसी भी भक्त से किसी प्रकार की वस्तु या राशि नहीं लेते। ऐसे में जिनकी भी भावना गुरुदक्षिणा देने की है वे कथा के बाद झोली लेकर खड़े कार्यकर्ताओं को दे देवें। जितनी भी राशि एकत्रित होगी, वह आनंद कवाड़ द्वारा मूक प्राणियों एवं जरूरतमंदों के लिए चलाये जा रहे रोटी बैंक को समर्पित होगी। बड़ी संख्या में भक्तों ने गुरुदक्षिणा भेंट की।

*समृद्धि के सिक्के सिद्ध करवाये?*

कथा में जगद्गुरू देव वसंत विजयानंद गिरी महाराज द्वारा दिव्य मंत्रोच्चार से सिक्के सिद्ध कराए गए। बड़ी संख्या में भक्त पूर्व घोषणा अनुसार सिक्के साथ लेकर आये थे। इन सिक्कों को घर के धन स्थान पर रखने से समृद्धि बढ़ती है।

*हाथी, घोड़े, पालकी, रथ के साथ रविवार को भव्य कलश यात्रा?*

रविवार 1 फरवरी को कृष्णगिरी पीठाधीश्वर जगद्गुरू वसंत विजयानंद गिरी की पावन निश्रा में भव्य कलश यात्रा निकाली जाएगी। हाथी, घोड़ा, पालकी, रथ और आकर्षक झांकियों से सजी कलश यात्रा प्रातः 11 बजे बालिया स्कूल के पास रामदेव मंदिर से प्रारंभ होकर मेड़तिया स्वीट होम, महाराणा प्रताप चौक, गुलजार चौक, सराफा बाजार, घी का झंडा, धानमंडी, रुई कटला, पुरानी सब्जी मंडी, सुराणा सराय, पुराना बस स्टैंड, रुचिता गैस होते हुए आयोजन स्थल अणुव्रत नगर ग्राउंड पहुंचेगी।