लोक भवन का मीडिया सेंटर बना 'बर्थडे क्लब': क्या सुरक्षा में सेंध लगाकर काटे जा रहे हैं केक*

लोक भवन का मीडिया सेंटर बना 'बर्थडे क्लब'? सरकारी सुविधाओं पर जश्न और सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

लखनऊ:उत्तर प्रदेश के सबसे संवेदनशील और उच्च सुरक्षा वाले परिसर 'लोक भवन' के मीडिया सेंटर को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। सरकारी काम-काज और प्रेस कवरेज के लिए निर्धारित इस परिसर में पत्रकारों द्वारा जन्मदिन मनाने और केक काटने का सिलसिला लगातार जारी है। सोशल मीडिया और फेसबुक वॉल पर जारी हो रही तस्वीरों से यह सवाल उठने लगा है कि क्या लोक भवन का प्रेस रूम अब जन्मदिन मनाने का केंद्र बन चुका है?

सोशल मीडिया पर 'ताकत' का प्रदर्शन?*
फेसबुक पर इन आयोजनों की तस्वीरें साझा कर यह दिखाने का प्रयास किया जा रहा है कि संबंधित पत्रकार कितने प्रभावशाली हैं। चर्चा है कि यदि इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर पोस्ट न किया जाए, तो ऐसे आयोजनों का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता। अपनी धाक जमाने के उद्देश्य से प्रेस रूम का उपयोग इस तरह के निजी कार्यक्रमों के लिए किया जा रहा है।

सरकारी चपरासियों का इस्तेमाल और तंत्र पर सवाल*
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन निजी आयोजनों में सरकारी संसाधनों और कर्मियों का खुलकर उपयोग हो रहा है। सरकारी तंत्र से वेतन पाने वाले चपरासी (जैसे रजनीश और अरुण) पत्रकारों के लिए पर बर्थडे केक लाने से लेकर अन्य व्यवस्थाएं मुहैया करा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या जनता के पैसे से वेतन पाने वाले सरकारी कर्मचारी अधिकारियों और पत्रकारों के निजी जश्न की व्यवस्था संभालने के लिए तैनात किए गए हैं?

*सुरक्षा और नियमों की अनदेखी पर मौन क्यों हैं जिम्मेदार*


यह मुद्दा जनहित और सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है।
जब प्रदेश के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों ने आज तक लोक भवन के किसी कक्ष में अपना जन्मदिन नहीं मनाया, तो पत्रकारों को प्रेस रूम में ऐसे आयोजनों की छूट किस आधार पर दी जा रही है?
�क्या सुरक्षा की दृष्टि से अति-संवेदनशील लोक भवन परिसर में इस तरह के आयोजनों की अनुमति देना उचित है?
�मुख्य सचिव, अपर मुख्य सचिव और अन्य उच्चाधिकारी इस पूरे घटनाक्रम पर आंखें मूंदकर क्यों बैठे हैं?
विधानसभा के अधिकृत प्रेस रूम जैसे स्थानों पर जहां केवल प्रेस कवरेज और आधिकारिक गतिविधियों की अनुमति होती है, वहां लोक भवन के मीडिया सेंटर का इस तरह इस्तेमाल होना प्रशासनिक ढिलाई को दर्शाता है। अब देखना यह होगा कि शासन और उच्च अधिकारी इस मामले पर क्या कड़ा संज्ञान लेते हैं या फिर यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा?