ज्वेलर्स की दुकान से कथित लूट के मामले में फर्जी बरामदगी और निर्दोषों को फंसाने का आरोप, तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर उठाए सवाल

12 साल पुराने मुकदमे की गूंज पहुंची शासन तक! रिटायर्ड दरोगा ने पुलिस अधिकारियों पर लगाए गंभीर आरोप, न्याय के लिए फिर लगाई गुहार

ज्वेलर्स की दुकान से कथित लूट के मामले में फर्जी बरामदगी और निर्दोषों को फंसाने का आरोप, तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर उठाए सवाल

#कानपुर नगर
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पुलिस की कार्यप्रणाली और पुराने मुकदमों की निष्पक्ष विवेचना को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। वर्ष 2014 में दर्ज लूट के एक मुकदमे को लेकर सेवानिवृत्त उपनिरीक्षक दयाशंकर वर्मा ने पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए न्याय की गुहार लगाई है। 27 अक्टूबर 2026 को दर्ज आईजीआरएस शिकायत में उन्होंने तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं।

शिकायतकर्ता दयाशंकर वर्मा के मुताबिक, वह 31 अक्टूबर 2022 को जनपद कानपुर नगर से पुलिस विभाग में एएसआई पद से सेवानिवृत्त हुए थे। वर्ष 2014 में उनकी तैनाती थाना बर्रा क्षेत्र की गुर्जनी चौकी में थी। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 2 जुलाई 2014 को गजानन ज्वेलर्स की दुकान से कथित लूट की घटना के बाद 8 जुलाई 2014 को मुकदमा अपराध संख्या 507/14 धारा 392 आईपीसी के तहत दर्ज कराया गया था।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि तत्कालीन पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध रही। तीन व्यक्तियों को कथित तौर पर फर्जी तरीके से पकड़कर लूट का सामान बरामद दिखाने तथा अन्य लोगों को भी इस मामले में फंसाने के आरोप लगाए गए हैं। शिकायत में सोने-चांदी के आभूषणों की कथित खरीद-फरोख्त और बरामदगी की कहानी पर भी सवाल उठाए गए हैं।

मामले में तत्कालीन थाना प्रभारी संजय मिश्रा,चौकी प्रभारी एवं अन्य पुलिसकर्मियों सहित कई लोगों की भूमिका का उल्लेख करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि इस प्रकरण में न्यायालय से संबंधित आदेशों के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिल सका। उन्होंने पहले भी शासन-प्रशासन के स्तर पर अपनी बात रखी, लेकिन समस्या का समाधान नहीं होने का आरोप लगाया है।

जांच के नाम पर कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सवाल

27 अक्टूबर 2026 की आईजीआरएस शिकायत के उपलब्ध दस्तावेज में शिकायतकर्ता और आरोपित पक्ष के बयान, घटनास्थल निरीक्षण, स्वतंत्र गवाहों के बयान, अभिलेखीय साक्ष्य तथा मेडिकल रिपोर्ट जैसे कई जांच संबंधी कॉलम में 'निल' दर्ज दिखाई दे रहा है। ऐसे में शिकायत के प्रत्येक बिंदु की वास्तविक स्थिति और जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

अब सवाल जवाबदेही का है!

करीब 12 वर्ष पुराने इस प्रकरण में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होना जरूरी है। यदि शिकायतकर्ता के आरोपों में सच्चाई है तो संबंधित जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और यदि आरोप निराधार हैं तो जांच के माध्यम से वास्तविकता सार्वजनिक होनी चाहिए।

आखिर एक सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी को न्याय के लिए बार-बार अधिकारियों के दरवाजे क्यों खटखटाने पड़ रहे हैं? क्या पुराने मुकदमे की पूरी सच्चाई सामने आएगी या शिकायत एक बार फिर सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगी?

#रिपोर्ट _डी डी शुक्ला 

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