अम्बेडकरनगर पुलिस का खेल, मुसलमानो को जेल, समाजवादी पार्टी और डीजीपी साहब का मेल, यूपी सरकार हुई फेल

*खाकी के खेल पर बड़ा सवाल: क्या उत्तर प्रदेश पुलिस सुनियोजित तरीके से बना रही है समाजवादी पार्टी के पक्ष में माहौल?*

 

लखनऊ।उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था एक बार फिर गंभीर और विस्फोटक चर्चा के केंद्र में है। मामला अंबेडकरनगर जिले के इब्राहिमपुर थाने का है, जहां पुलिस की कार्यशैली ने योगी आदित्यनाथ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति और प्रशासनिक साख पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सैलून में बाल कटवा रहे एक सामान्य नागरिक को जबरन उठाकर फर्जी तमंचे के साथ जेल भेजने के इस कुचक्र और अदालत के कड़े हस्तक्षेप के बाद अब यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि क्या उत्तर प्रदेश पुलिस का एक धड़ा अंदरखाने समाजवादी पार्टी (SP) के पक्ष में राजनीतिक माहौल तैयार करने में जुटा है?

 

*सैलून से उठाव और जेल भेजने का ?खेल*

घटनाक्रम के मुताबिक, रविवार दोपहर को इब्राहिमपुर थाना क्षेत्र के स्थानीय निवासी साकिब बेग एक सैलून में इत्मीनान से बाल कटवा रहे थे, तभी एक काली स्कॉर्पियो में आए 4-5 पुलिसकर्मियों ने उन्हें जबरन गाड़ी में ठूंस लिया। जब परिजनों ने थाने पहुंचकर सुध ली, तो उन्हें सामान्य पूछताछ का झांसा दिया गया, लेकिन अगले ही दिन यानी सोमवार सुबह पुलिस ने उन्हीं साकिब बेग को एक अवैध तमंचे और कारतूस के साथ संगीन मामले में दबोचकर जेल भेजने की थ्योरी गढ़ दी।

पीड़ित पक्ष के अनुसार, लगभग दो साल पहले भी इसी इब्राहिमपुर थाने की पुलिस ने साकिब बेग को लखनऊ के नीलमाथा से उठा लिया था। तब भी बिना एफआईआर में नाम होते हुए उन्हें ले जाकर जबरन 307 (हत्या का प्रयास) के मुकदमे में मुल्जिम बना दिया गया था, जबकि बाद में उनका नाम विवेचक द्वारा सम्मिलित किया गया था।

 

*पुरानी रंजिश और फर्जी कार्रवाई का गंभीर आरोप*

पीड़ित परिवार ने आरोप लगाया है कि एक पढ़े-लिखे और भविष्य वाले लड़के का जीवन पुलिसवालों ने इस प्रकार की हरकतों से खराब कर दिया है। परिवार का यह भी कहना है कि:

 * बार-बार इस तरह की कार्रवाई करके कहीं पुलिस फर्जी एनकाउंटर न कर दे, इस बात का उन्हें गहरा डर सता रहा है।

 * साकिब बेग के पिता के ऊपर भी ये लोग लगातार नजर रखे हुए हैं और किसी न किसी धारा में फंसाने की फिराक में हैं।

 * पुलिस का यह नया हथकंडा और हथियार दिखाना किसी बड़े और गहरे षड्यंत्र की ओर इशारा करता है।

 

*कोर्ट की फटकार और पुलिस के चेहरे पर तमाचा*

गनीमत यह रही कि परिजनों को पुलिस की नीयत पर पहले ही एनकाउंटर या गंभीर फर्जी मामले में फंसाए जाने की आशंका हो गई थी। बिना एक पल गंवाए परिजनों ने रविवार को ही प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और जिला सत्र न्यायाधीश को लिखित पत्र भेजकर पूरी अनहोनी से अवगत करा दिया था।

परिणामस्वरूप, जब सोमवार को पुलिस ने आरोपी को न्यायालय के समक्ष पेश किया, तो अदालत ने पुलिस के इस फर्जीवाड़े को तुरंत भांप लिया। न्यायाधीश ने पुलिस की इस मनमानी और गैर-कानूनी हरकत पर तीखा रोष जताते हुए कड़ी फटकार लगाई और साकिब बेग की तत्काल रिहाई का हुक्म सुना दिया। अदालत के इस फैसले को खाकी के चेहरे पर एक जोरदार तमाचा माना जा रहा है।

 

*राजनीतिक गलियारों में सुलगता सवाल:क्या डीजीपी के जरिए सजाया जा रहा है सपा का सियासी मैदान?*

इस पूरे प्रकरण के सामने आने के बाद अब सियासी और प्रशासनिक हलकों में यह सवाल आग की तरह फैल गया है कि क्या उत्तर प्रदेश पुलिस का एक वर्ग सुनियोजित ढंग से समाजवादी पार्टी के पक्ष में जमीन तैयार कर रहा है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं के पीछे एक सोची-समझći रणनीति हो सकती है:

 * विशेष वर्ग को प्रताड़ित कर ध्रुवीकरण करना: यदि पुलिस किसी विशेष समुदाय के आम और निर्दोष नागरिकों को इस तरह सरेआम उठाकर फर्जी मामलों में जेल भेजने का खेल खेलेगी, तो समाज में असुरक्षा और आक्रोश का माहौल पैदा होगा।

 * सपा के पक्ष में वोट बैंक को एकजुट करना: इस प्रकार की दमनात्मक कार्यवाहियों से उपजा असंतोष अंततः एक खास राजनीतिक दल (सपा) के पक्ष में सियासी माहौल बनाने का काम करता है, क्योंकि यह धारणा मजबूत की जाती है कि विशेष धर्म के लोग वर्तमान शासन में सुरक्षित नहीं हैं।

 

*योगी सरकार की मंशा बनाम मैदानी हकीकत*

यह सर्वविदित है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीति स्पष्ट है?अपराधियों का सफाया हो, लेकिन किसी भी निर्दोष या सामान्य नागरिक के साथ अन्याय न हो। इसके बावजूद, मैदानी स्तर पर इस प्रकार के कृत्य यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या पुलिस तंत्र के भीतर बैठे कुछ लोग सरकार की छवि को धूमिल करने और विपक्ष (विशेषकर समाजवादी पार्टी) को बैठे-बिठाए राजनीतिक मुद्दे थमाने की सुपारी ले चुके हैं?

फिलहाल, अदालत के इस कड़े रुख के बाद न्याय तो मिल गया है, लेकिन जनता के बीच सुलग रहा यह सवाल सबसे बड़ा है कि ऐसे मामलों में अब डीजीपी स्तर से क्या कदम उठाए जाते हैं, या फिर खाकी की आड़ में सियासत का यह खेल यूं ही जारी रहेगा?