संस्कारों की थाती को संजोकर रखना है : प्रो सच्चिदानन्द जोशी

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रखना है: प्रो सच्चिदानन्द जोशी

हिंदी विभाग में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू�

झांसी। प्रख्यात साहित्यकार और शिक्षाविद प्रो. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि हमें अपनी परंपरा, संस्कार और संस्कृति को बिना किसी न्यूनता बोध या संकोच के आगे बढ़ाना चाहिए। हमें अपने संस्कारों की थाती को संजोकर रखना है तभी भारतीय ज्ञान परंपरा आगे बढ़ेगी। उन्होंने उक्त विचार बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त सम्मान समारोह के उद्घाटन सत्र में व्यक्त किए।�

प्रो जोशी ने कहा कि जो राष्ट्र अपने महापुरुषों का सम्मान नहीं कर सकता उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा कैसे मिलेगी। प्रो. जोशी ने तमसो मा ज्योतिर्गमय मंत्र से अपने उद्बोधन का श्रीगणेश किया। उन्होंने सवाल पूछा कि क्या मैथिलीशरण गुप्त शेक्सपियर, टालस्टाय,मोजार्ट आदि से किसी मायने में कम हैं। उन्होंने कहा कि जब हम बाहर जाते हैं तो वहां के महापुरुषों का गांव देखते हैं टिकट लेकर। उन्होंने कहा कि सभी विद्यार्थियों को मैथिलीशरण गुप्त की नगरी चिरगांव का अवलोकन करना चाहिए। यही नहीं सभी मिलकर उसे वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण पहचान दिलाने का संकल्प भी लें।

प्रो जोशी ने बताया कि मेरे बचपन का बड़ा-सा हिस्सा बुंदेलखंड में बीता है। ऐसे में इसकी विशिष्टताओं से परिचित हूं। उन्होंने कहा कि ज्ञान परंपरा के अवयव विकास में भी अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने सांस्कृतिक परिवेश की ऊष्मा को भी ज्ञान परंपरा का अवयव बताया। उन्होंने कहा कि नानी,दादी की कहानियां भी ज्ञान परंपरा का अंश है। उन्होंने गुप्त जी की भारत भारती का जिक्र करते हुए कहा कि जो चिंता उसमें व्यक्त की गई वो आज के समाज की भी है। उन्होंने कहा कि हमें ध्यान रखना होगा कि डिजिटल तकनीक के कारण हमारी रचनाधर्मिता तो खतरे में नहीं पड़ रही है। हमें सत्यता और परिवेश के मूल तत्व को बांधकर रखना होगा। जड़ों से जुड़कर रहना है। जड़ों से कटने वाले कहीं के नहीं रह जाते हैं। युवाओं को अपनी ज्ञान परंपरा को सहेजकर आगे बढ़ना है। भारत कैसे आगे बढ़ेगा, इसके उपायों पर भी हमें विचार करना है।

भारतीय ज्ञान परंपरा में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का प्रदेय विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी मे

बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो मुकेश पाण्डेय ने डा. सच्चिदानंद जोशी समेत सभी अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि मैथिलीशरण गुप्त की हर कृति में देश प्रेम का संदेश है। वे अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कहा कि हर विद्यार्थी को राष्ट्रकवि की जन्म और कर्मस्थली का अवलोकन करवाया जाए। इससे सभी को उनके बारे में सही जानकारी मिलेगी। युवाओं को सही प्रेरणा भी मिलेगी। प्रो पाण्डेय ने कहा कि युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने के विश्वविद्यालय हरसंभव प्रयास बड़ी शिद्दत से कर रहा है। उन्होंने सभी शिक्षाविदों से उचित मार्गदर्शन की अपेक्षा की। उन्होंने युवाओं के कौशल को बढ़ाने की खातिर बेहतर कदम उठाने का भरोसा दिया।

कुलपति प्रो पाण्डेय ने मुख्य अतिथि, सारस्वत अतिथि, विशिष्ट अतिथि को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। इस कार्यक्रम में सुमित कुमार मिश्रा की पुस्तक नवभारत का न्याय दर्शन का भी लोकार्पण किया गया।

प्रो उमापति दीक्षित ने शिवार्चन शिवताण्डव स्तोत्रम सुनाकर अपनी बात की शुरुआत की। पूरा हाल शिव भक्ति से सराबोर हो गया। हर हर महादेव के जयघोष से वातावरण गुंजायमान हो गया। उन्होंने कहा कि किसी आचार्य के विचार को सुनना सौ किताबों के पढ़ने के बराबर है। आचार्य से ज्ञान का सत्व मिलता है। गुप्तजी की रचना नर हो न निराश करो मन को का उल्लेख करते हुए कहा कि यह हर व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। जब समस्याएं सुरसा की तरह बढ़ जाएं तो भारतीय ज्ञान परंपरा ही सही राह सुझाती है। उन्होंने कहा कि हर भारतीय को अपनी भाषा पर गर्व होना चाहिए। प्रो दीक्षित ने कहा कि महाभारत काल में जैसी औषधि अब कहां है। वो कौन सी विधि थी कि क्षत विक्षत योद्धा उसके प्रयोग से ठीक हो जाते थे। वो कौन सी तकनीकी थी कि दुर्योधन क्षत विक्षत होकर भी तालाब में छिपा होने के बाद भी बाहर की गतिविधियों से भिज्ञ कैसे था।

साहित्यकार अंकित सिद्धांत ने कहा कि भारत भारती ने युवाओं में अभूतपूर्व उत्साह भरा। उन्होंने प्रधानमंत्री के पंच प्रण के आह्वान का भी उल्लेख किया। उन्होंने गुप्तजी की रचना का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा अद्वितीय है, इसका उद्घोष पूरे विश्व के समक्ष तब किया जब देश पराधीन था।�

शुरुआत में विभागाध्यक्ष और डीन कला संकाय अधिष्ठाता प्रोफेसर पुनीत बिसारिया ने सभी अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने बताया कि इस संगोष्ठी में आए शोध-पत्रों को एक पत्रिका में प्रकाशित किया जाएगा।

इस कार्यक्रम में आए सभी अतिथियों को पौध भेंटकर स्वागत किया गया।

इस कार्यक्रम में डा बीवी त्रिपाठी, प्रोफेसर मुन्ना तिवारी,डा श्रीहरि त्रिपाठी, डा विपिन प्रसाद, डा सुधा दीक्षित, डा प्रेमलता, डा सुनीता, डा कौशल त्रिपाठी,डा राघवेन्द्र दीक्षित, डा अभिषेक कुमार, डा शंभूनाथ घोष, उमेश शुक्ल, डा स्वप्ना सक्सेना, डा द्युतिमालिनी, अतीत विजय समेत अनेक लोग उपस्थित रहे। संचालन डा अचला पाण्डेय ने किया। अंत में डा. श्रीहरि त्रिपाठी ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।