टिकट खिड़की पर 'खुले पैसों' का खेल, यात्रियों की मजबूरी से रोज़ बन रहा मोटा फंड

बिजनौर।

रेलवे को देश की लाइफलाइन कहा जाता है और हर दिन हज़ारों लोग स्योहारा रेलवे स्टेशन से अपनी मंज़िल के लिए ट्रेन पकड़ते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से स्योहारा रेलवे स्टेशन का टिकट काउंटर यात्रियों के लिए सहूलियत की जगह मानसिक प्रताड़ना और अवैध वसूली का अड्डा बन चुका है। टिकट खिड़की पर बैठने वाले कर्मी की मनमानी और 'बदमाशी' के चलते हर दिन सैकड़ों गरीब और मध्यमवर्गीय यात्रियों की जेब पर खुलेआम डाका डाला जा रहा है।

मामला सीधा और साफ है, जिसे हर दूसरा यात्री भुगत रहा है। जब भी कोई मुसाफिर टिकट खरीदने काउंटर पर जाता है, तो टिकट बाबू के पास एक रटा-रटाया बहाना तैयार रहता है? "खुले पैसे नहीं हैं।"

हैरानी की बात यह है कि यह केवल एक या दो रुपये का मामला नहीं है। यात्रियों से एक रुपया, दो रुपये, तीन रुपये, चार रुपये और यहाँ तक कि पाँच रुपये तक की रकम वापस नहीं की जा रही है। देखने में यह रकम बेहद छोटी लग सकती है, लेकिन अगर रोज़ाना स्टेशन से टिकट लेने वाले हज़ारों यात्रियों के हिसाब से जोड़ा जाए, तो यह महीने भर में हज़ारों-लाखों रुपये के 'अवैध मुनाफे' का काला खेल बन जाता है।

अगर कोई जागरूक नागरिक या यात्री अपने हक के बचे हुए पैसे मांग भी लेता है, तो उसे टिकट कर्मी के गुस्से का सामना करना पड़ता है। काउंटर से सीधे शब्दों में कह दिया जाता है, *"खुले पैसे लेकर आओ, नहीं तो आगे बढ़ो।"

अब बड़ा सवाल यह है कि जब ट्रेन का समय हो रहा हो, सिग्नल डाउन हो चुका हो और ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आने वाली हो, तो कोई यात्री अपनी ट्रेन छोड़कर स्टेशन के बाहर पैसे चेंज कराने कहाँ जाएगा? इसी मजबूरी का फायदा टिकट खिड़की पर बैठा व्यक्ति बखूबी उठा रहा है। समय की कमी और ट्रेन छूटने के डर से लोग हार मानकर अपने पैसे काउंटर पर ही छोड़ देते हैं।

रेलवे के नियमों के मुताबिक, टिकट काउंटर पर पर्याप्त मात्रा में कैश और चेंज (चिल्लर) रखना प्रशासन की ज़िम्मेदारी है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहाँ एक तरफ सरकार हर छोटे-बड़े भुगतान को पारदर्शी बनाने की बात करती है, वहीं स्योहारा रेलवे स्टेशन पर चल रही यह तानाशाही प्रशासन के दावों की पोल खोलती है।

गरीब और मज़दूर तबके के लोग, जिनके लिए एक-एक रुपया कीमती है, वे इस मूक शोषण का सबसे ज़्यादा शिकार हो रहे हैं। यात्रियों की इस मजबूरी को कमाई का ज़रिया बना लेना बेहद शर्मनाक है।

स्थानीय यात्रियों और दैनिक मुसाफिरों ने इस मामले में उच्च अधिकारियों से संज्ञान लेने की मांग की है। क्या मुरादाबाद रेल मंडल के अधिकारी स्योहारा स्टेशन की इस अंधेरगर्दी पर कोई ठोस कार्रवाई करेंगे? या फिर यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाकर टिकट बाबू इसी तरह अपनी जेबें गरम करता रहेगा, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।