* रूढ़िवादिता पर कड़ा प्रहार करने वाले महान समाज सुधारक -संत कबीर दास *

सच्चाई, सादगी और समाज सुधार के प्रतीक महान संत कबीर दास जी की सीख आज के आधुनिक युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी सदियों पहले थी। कबीर दास जी ने अपनी साखियों और दोहों के माध्यम से समाज में फैले अंधविश्वास, पाखंड और जात-पात के भेदभाव पर कड़ा प्रहार किया था

माना जाता है कि संत कबीर दास जी का जन्म ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को हुआ था। उनका लालन-पालन वाराणसी (काशी) में एक जुलाहा परिवार (नीरू और नीमा) द्वारा किया गया। कबीर जी ने किसी औपचारिक विद्यालय से शिक्षा नहीं ली थी, लेकिन उनका व्यावहारिक ज्ञान और आध्यात्मिक अनुभव बेहद गहरा था। उन्होंने स्वयं कहा था:

"मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यो नहिं हाथ "

कबीर दास जी किसी एक धर्म के नहीं, बल्कि मानवता के पैरोकार थे। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों में व्याप्त कुरीतियों और बाह्य आडंबरों की खुलकर आलोचना की। उन्होंने समाज को यह सिखाया कि ईश्वर किसी खास तीर्थ स्थान या मस्जिद में नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर मौजूद है।

कबीर जी के मुख से निकले वचनों को उनके शिष्यों ने **'बीजक'** नाम के ग्रंथ में संग्रहित किया, जिसके तीन मुख्य भाग हैं:

1. **साखी:** इसमें कबीर के दोहे और शिक्षाएं हैं।

2. **सबद:** इसमें गेय पद (भजन) हैं।

3. **रमैनी:** इसमें चौपाई छंद में आध्यात्मिक विचार हैं।

> *"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,*

> *ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ,

* वाराणसी के **लहरतारा** (कबीर प्राकट्य स्थल) और **मगहर** (जहाँ उन्होंने अंतिम सांस ली)