स्मार्टफोन के अधिक उपयोग का बच्चों पर पड़ रहा है मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव : डॉ जितेन्द्र उपाध्याय 

सुल्तानपुर : आजकल बच्चों द्वारा स्मार्टफोन का दुरूपयोग किये जाने के कारण उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव बहुत बड़ी चिंता का विषय बन चुका है। हाल के वर्षों (2024-2025) की कई रिसर्च और अध्ययनों से पता चलता है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम, खासकर सोशल मीडिया और स्मार्टफोन की लत, बच्चों के दिमाग, भावनाओं और व्यवहार पर गहरा नकारात्मक असर डाल रही है।

स्मार्टफोन के अधिक प्रयोग से बच्चों पर पड़ने वाले नकारात्मक मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभावों के प्रभावों पर किये गये अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि ज्यादा स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले बच्चों में अवसाद और चिंता में अवसाद, चिंता और उदासी के लक्षण काफी बढ़ जाते हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की "परफेक्ट" लाइफ देखकर बच्चे खुद को कमतर महसूस करते हैं, जिससे आत्म-सम्मान कम होता है। नींद की कमीं और उसका असर रात में फोन इस्तेमाल करने से नींद खराब होती है। अधिक स्मार्टफोन का उपयोग ब्लू लाइट मेलाटोनिन हार्मोन को प्रभावित करती है। जिसके कारण नींद कम होने से चिड़चिड़ापन, एकाग्रता की कमीं और मानसिक थकान बढ़ती है। कई अध्ययनों में पाया गया कि 12 साल से पहले स्मार्टफोन का उपयोग करने वाले बच्चों में नींद की समस्या 60% तक ज्यादा होती है। बच्चों में स्मार्टफोन की लत और व्यसन से फोन छीनने पर गुस्सा, रोना, जिद या आक्रामकता का प्रदर्शन दिखाई देता है। यह डोपामाइन रिवार्ड सिस्टम को प्रभावित करता है, जिससे बच्चा बार-बार फोन चेक करता रहता है। स्मार्टफोन के अधिक प्रयोग से भावनात्मक नियंत्रण में कमी पायी जाती है। कम उम्र में फोन इस्तेमाल करने से बच्चे अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना नहीं सीख पाते। इससे आक्रामकता, जिद्दीपन और असामाजिक व्यवहार की प्रवृत्ति में वृद्धि को बढ़ावा मिलता है। बच्चों में सामाजिक अलगाव, एकाकीपन और असल रिश्तों में कमीं देखी जा सकती है। बच्चे असल दोस्तों से कम मिलते हैं, परिवार से बात कम करते हैं और अकेलापन महसूस करते हैं। फियर आफ मिशिंग आउट के कारण बच्चों में लगातार चिंता बनी रहती है। स्मार्टफोन के अधिक उपयोग से बच्चों में साइबरबुलिंग का खतरा बना रहता है। सोशल मीडिया पर बुलिंग, ट्रोलिंग या नेगेटिव कमेंट्स से बच्चों में डर, शर्मिंदगी और कभी-कभी आत्महत्या करने के विचार तक आ सकते हैं। कुछ अध्ययनों में पाया गया कि 13 साल से पहले स्मार्टफोन का उपयोग करने वाले बच्चों में आत्महत्या का विचार पनपने का खतरा ज्यादा होता है।

एक अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि स्मार्टफोन के अधिक उपयोग से बच्चों के दिमाग के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बच्चे का प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स (निर्णय लेने और इंपल्स कंट्रोल वाला हिस्सा) अभी विकसित हो रहा होता है। ज्यादा स्क्रीन टाइम इसे प्रभावित कर सकता है, जिससे ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत, हाइपरएक्टिविटी और व्यवहार संबंधी समस्याएं बढ़ती हैं। 13 साल से पहले स्मार्टफोन का उपयोग सबसे ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है। वर्ष 2025 में किये गये अध्ययनों (जैसे सीएचओपी, जेएएमए,आदि) में पाया गया कि 12 साल की उम्र में स्मार्टफोन फोन के उपयोग से अवसाद, मोटापा और नींद की समस्या का खतरा बच्चों में बढ़ता है, जबकि बालिकाओं में इमोशनल रेगुलेशन और सेल्फ-वर्थ अधिक प्रभावित होता है। किशोरावस्था के बच्चों पर सोशल मीडिया की तुलना, बॉडी इमेज इश्यू और स्लीप डिस्टर्बेंस से मानसिक स्वास्थ्य का बिगड़ता स्वरूप देखा जा सकता है। सुक्षाव के रूप में अपेक्षित है कि 13-14 साल तक के बच्चों को स्मार्टफोन फोन देने से बचें या नियंत्रण की स्थिति में बहुत सीमित इस्तेमाल रखें। प्रतिदिन स्क्रीन टाइम लिमिट सेट करें (2 घंटे से कम मनोरंजन के लिए)। फोन-फ्री जोन (डिनर टेबल, बेडरूम) बनाएं। बच्चे के साथ बातचीत बढ़ाएं, खेलकूद और आउटडोर एक्टिविटी को प्रोत्साहन दें। यदि बच्चों में स्मार्टफोन की लत के लक्षण दिखें, जैसे चिड़चिड़ापन, नींद न आना, पढ़ाई में गिरावट आदि, तो बाल मनोचिकित्सक से सलाह लिया जाना आवश्यक है। स्मार्टफोन से होने वाले मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव में वैयक्तिक भिन्नता पायी जाती है। प्रत्येक बच्चे पर यह प्रभाव अलग-अलग हो सकता है, लेकिन ज्यादातर अध्ययन यही बताते है कि "कम उम्र में ज्यादा इस्तेमाल" सबसे बड़ा खतरा है। माता-पिता की जागरूकता और संतुलित इस्तेमाल से इन दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

लेखक : मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष, संत तुलसीदास पीजी कॉलेज कादीपुर सुल्तानपुर