खंडीघाट, खंडेश्वर महादेव दर्शन 

विधा ? यात्रा वृतांत
रचना का शीर्षक ? खंडीघाट, खंडेश्वर महादेव दर्शन
रचनाकार का नाम ? संजय वस्त्रकार
रचना -

1मार्च 2022 भारतीय पंचांग के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन सुहानी सुबह, जब परिवार ने सुझाया कि आज हम लोग खंडीघाट, खंडेश्वर महादेव का दर्शन करने जाएंगे। मैंने इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया। खंडीघाट की दूरी महज 14 किलोमीटर है। इस जगह पर प्राकृतिक सौंदर्य, देवालय, जंगली जानवर, पुरातात्विक अवशेष विद्यमान होने के कारण स्थानीय लोगों में बहुचर्चित है। मेरे साथ-साथ आठ वर्षीय पुत्र-उत्कर्ष, तेरह वर्षीय पुत्री-उज्जवी व उसकी सहेली-साक्षी यादव और हम सभी का ध्यान रखने वाली उत्तरा जी के साथ-साथ खंडेश्वर महादेव के दर्शन के लिए निवास स्थल दुर्गुकोंदल से निकल पड़े। दुर्गकोंदल से खुटगाँव, हानपतरी वनाच्छादित मार्ग से होते हुए हम लोग कुछ ही देर में आमागढ़ पहुँच गए,यहाँ से कच्ची मार्ग पकड़कर आगे बढे, महज एक किमी की दुरी पर ग्राम एडगुड स्थित है, वहाँ पहुंच गए। ग्राम में अभी भी पारंपरिक घर,पारंपरिक परिधान में महिलाएं व बुजुर्ग नजर आ रहे थे, परंतु युवाओं की वेशभूषा आधुनिकता लिए नजर आ रहा था। एडगुड से हमारी कार खंडीघाट की ओर आगे बढ़ी। खस्ताहाल पहाड़ी रास्ता और प्राकृतिक सौंदर्य हमें रोमांचित और आनंदित कर रहा था। वाहन जाने लायक कच्ची सड़क पर हम आगे बढ़ते चले जा रहे थे, कच्ची मार्ग के दोनों ओर लहलहाती मक्के की फसल से मार्ग का सौंदर्य झलक रहा था, थोडा और आगे बढ़े तो एक ओर पहाड़ी पर लौह अयस्क खनन कार्य चल रहा था, जिससे जंगल को कितना नुकसान हुआ होगा इसकी हम सिर्फ अनुमान लगा रहे थे, परंतु घने वृक्षों से जंगल अभी भी घिरा है। दूसरी ओर खंडी नदी सर्पाकार में बह रही थी आसपास का सौंदर्य काफी मनोरम था। कुछ दूर आगे बढ़ने के बाद कार से उतरकर खंडेश्वर महादेव के दर्शन के लिए पैदल चल पड़े। रास्ते मे मेला लगा हुआ था, इस मेले में जरूरत के सामान, स्थानीय कृषि उत्पाद, कंदमूल, जंगल के उत्पाद, होटल व अन्य दुकाने ऐसे कतारबद्ध सजे थे जैसे पर्यटकों के स्वागत में सजाया गया हो। बाज़ार स्थल से आगे पथरीली रास्ता में खंडीघाट की एक पाट के किनारे-किनारे हम सभी चलते हुए आगे बढ़ रहे थे। यहाँ के पत्थरों का रंग गहरा काला लिए हुए चमकीला हैं जो लौह की मात्रा होने का गवाही दे रहा था। यहाँ के पत्थरों,पेड़ों व मिटटी में लाल, पीले व धूसर रंग के क्रस्टोस लाइकेन की लेकानोरा शैवाल की परत चिपका हुआ था, वैज्ञानिको का मानना है कि इस तरह का शैवाल नम, छायादार स्थान में उगते हैं, ऐसा स्थान प्रदूषण मुक्त होता है। हम आगे बढ़े नदी के बहती जलधारा में पत्थरों की धारीदार रंग ने आकर्षित किया, यह ज्वालामुखी के लावे की परत की साक्ष्य साबित कर रही थीं। अब हम नदी के मध्य में थे, जहाँ से नदी के दोनों पाटो का सौंदर्य देखते ही बन रहा था। झाड़ियों व दुर्लभ वनौषधि के बीच विशाल वृक्ष और उनकी जड़े चट्टानों को लपेटे हुए ऐसा लग रहा था जैसे चट्टानों को अपने भुजाओ में जकड कर रखा हो इन सभी की अद्भुत, अलौकिक दृश्य जो हम सभी को रोमांचित कर रहा था। खंडीघाट के एक पाट पर मोहनी देवी,(मोहनी पत्थर),के अलावा इस पाट पर सिद्धेश्वर महादेव,योगी गुफा,बारह ज्योतिर्लिंग के अतिरिक्त अनेक मूर्तियों को स्थापित किया गया है। नदी के दूसरे पाट पर खण्डेश्वर महादेव,भगवान् गणेश, माता पार्वती माता दुर्गा,रामभक्त हनुमान, देवी काली की खुबसुरत प्रतिमाएं स्थापित हैं। भक्तों की हर-हर महादेव की जयकारे के साथ मंदिर की घण्टियों, शंखनाद से वातावरण गूंजायमान हो रहा था, जो मन को प्रफुल्लित कर रहा था। यहाँ की खूबसूरत प्राकृतिक सौंदर्य व देवालय मन को लुभा रहा था। हम सभी स्वच्छ जल से बहती नदी को पार करके खंडेश्वर महादेव मंदिर दर्शन के लिए पहुंच गए। अब हम खण्डेश्वर महादेव मंदिर के पट के सामने प्रवेश के लिये खड़े थे। दर्शनार्थियों की लंबी कतार लगी थी। गर्भगृह में प्रवेश करते ही अद्भुत दृश्य देखने को मिला। देवालय में खंडेश्वर महादेव की प्रतिमा में स्वर्ण गंगा जलधारा( पुजारी द्वारा दिया हुआ नाम) से अनवरत अभिषेक हो रहा था, साथ मे मां दुर्गा,भगवान रामचंद्र के अनंत भक्त हनुमान जी की प्रतिमा इस देवालय में स्थापित की गई है। इस जलधारा ने मन में कौतूहल उत्पन्न किया? जिसका पुजारी दसरू राम राठौर एवं राम जी गावड़े ने समाधान करते हुए बताया कि सन 2001 से हम लोग निस्वार्थ सेवा दे रहे हैं और जन सहयोग से मंदिर का निर्माण कर विकास में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि सोनादही से यह जलधारा निकल रही है जो स्वर्ण युक्त है जिसके कारण इसे स्वर्ण गंगा जलधारा कहा गया है। इसी जलधारा से खंडेश्वर महादेव का अनवरत जल अभिषेक बारहमास होते रहता है। देवालय से थोड़ी ही दूर में एक गुफा है और थोड़ी ऊँचाई पर मां काली की प्रतिमा स्थापित कर मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है। किवंदती है कि सोनादही से दूसरी जलधारा झरनदल्ली में बहता है। इन्होंने इस प्राकृतिक मनोरम व धार्मिक स्थल की अनेक कहानियां भी बताई, जैसा कि खंडीघाट नाम को लेकर उन्होंने कहा कि महाभारत कालीन साक्ष्य दंडकारण्य क्षेत्र में उड़कुड़ा पहाड़ी में मिला है। जिसका संबंध इस जगह से भी है, जनश्रुति है कि भीम(पांडव पुत्र) ने देवकोठार से लक्ष्यभेद किया जिससे खंडीघाट में स्थित विशाल पत्थर इस लक्ष्य भेद से उस पत्थर को दो खण्ड कर दिया, (नदी के बीचों-बीच एक विशाल पत्थर है जिस पर तीर का निशान स्पष्ट दिखाई देता है) इसे तीर(भीम) पत्थर कहा जाता है और इस जगह को तीर पत्थर (भीमपत्थर) के दो खण्ड होने के कारण खंडीघाट नाम दिया गया ।
दर्शन के बाद हम सभी आगे बढ़े जहाँ कुछ स्थानीय लोगों से मुलाक़ात करने व बातचीत करने का अवसर मिला। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में भेजरगढ़ एक नगर था। जिस पर द्वापर युग में राजा शांतेश्वर का शासन था। भेजरगढ़ क्षेत्र में नौ लाख घरो का परिवार बस्ता था, जिसका आज भी निशान राजाबाड़ा में देखा जा सकता है। इसका रोमांच हम सभी को भेजरगढ़ की ओर बरबस ही खींच लाया। लगभग 250 मीटर ही चले होंगे कि माता बहादुर कलारिन की मंदिर दिखाई देने लगा यहाँ स्मृतियां के अवशेष जिसमे प्रमुख रूप से शराब बनाने की बर्तननुमा पत्थर निर्मित (डोंगी) मौजूद है, इसका कलचुरी राजाओं के साथ संबंध बताया जाता है। भेजरगढ़ के निवासरत वनवासी बताते हैं की कुछ वर्ष पहले तक इस डोंगी पत्थर में बोतल के साथ एक निर्धारित राशि छोड़ देते थे और कुछ देर बाद जब हम वापस आते थे, तो वह बोतल महुआ की शराब से भरा हुआ मिलता था। उसकी स्मृति में कलार समाज द्वारा बहादुर कलारीन मंदिर की स्थापना व एक अतिथिगृह का निर्माण कर इसकी संरक्षण कर रहे है। यहाँ उपस्थित समाज के प्रमुख सियाराम जैन,परमा लाल पांडे स्थानीय पुजारी ने बताया कि मंदिर के ठीक सामने सोनादई जल कुण्ड की धारा का स्त्रोत ठीक सामने खंडीनदी में आकर मिलता है जिसके फलस्वरूप इस नदी के रेत के कण में स्वर्ण पाया जाता है ,इसके उपर नदी के रेत में स्वर्ण नही पाया जाता । यहाँ से ग्राम भेजर दिखाई दे रहा थ। हम आगे बढे समतल सपाट मैदान में नदी के किनारे में मक्के की लहलहाती फसल, दूसरी तरफ सोनादही पहाड़ी की चोंटी मनोरम दृश्य बना रही थी, इसी चोटी के सतह पर राजाबाडा का अवशेष अभी भी मौजूद है। अंत में स्थानीय लोगो ने कहा कि सरकारी उदासीनता के चलते हालात विकट है लौह उत्खनन से एक पाट पूरा नष्ट हो जाएगा एवं धीरे-धीरे रासायनिक एवं जैविक प्रतिक्रियाओं को देखते हुए तुरंत आवश्यक कदम नहीं उठाए गए तो प्राकृतिक मनोरम दृश्य, पुरातात्विक अवशेष एवं धार्मिक केंद्र नष्ट हो जाएगा। आशा है कि निकट भविष्य में प्रकृति पूजक, पुरातात्विक प्रेमियों एवं धार्मिकता की अच्छी और सच्ची भावना प्रबल होगी और इस स्थान का भाग्योदय होगा।