_ये देश के 'माननीय' लोकतंत्र के मंदिर में क्या 'तमाशा' कर रहे हैं?_

_ये देश के 'माननीय' लोकतंत्र के मंदिर में क्या 'तमाशा' कर रहे हैं?_

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हंस रहा है माननीय आप पर देश व देशवासी..

जनता व जनहित के मुद्दे क्या खत्म हो गए? कहां हैं संसद में आम आदमी की परेशानियां?
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अब देश में रोटी-कपड़ा-मकान और चिकित्सा शिक्षा मुद्दा नहीं शायद। न ये मसले अब राजनीति का विषय रह गए हैं। आम आदमी की रोजमर्रा की दिक्कतें अब शायद संसद की चर्चा का केंद्र नहीं रह गई।अगर ऐसा नहीं है तो कहां है लोकतंत्र के मंदिर में आम आदमी? वहां तो झोले हैं।मनुस्मृति है।संविधान है।उसमें कथित बदलाव हैं।उसका अपमान है।आरक्षण है।

#अब_यूजीसी_कानून हैं।रुद्रावतार के नजारे हैं।दोनों तरफ से दलित हितैषी होने की होड़ मची है।सदन से सड़क तक बस ये ही मसले हैं।देश व देशवासी कहां हैं?आम आदमी की दुश्वार होती दाल-रोटी कहां हैं?अब सब तो मुफ्त का नहीं खा रहे हैं? जो पा रहे हैं, उनकी असली परेशानियों पर बात क्यों नहीं?आखिर कब तक ये देश संविधान, आरक्षण, मनुस्मृति,झोले,झंडे झेलेगा? माननीयो! कुछ तो रहम कीजिए।जनता की अदालत में फैसला हो गया न?अब तो दम ले लो माननीयो।क्यों देश व देशवासियों का दम निकाल रहे हो।कभी लूण-तेल' को भी चर्चा का केंद्र बनाओ न। बरसों हो गए इस पर आपकी मुखरता को सुने।

माननीयो ! कुछ तो रहम कीजिए। आप अब भी देश को 1990 के दौर का समझ रहे हैं? अब तो सब कुछ खुला हुआ है।आम आदमी कहां है सदन में?उसके रोजमर्रा जीवन की दुश्वारियों की गूंज कहां गुम है?अब सदन में आम आदमी क्यों नहीं चर्चा का केंद्र है?कभी संसद,कभी संविधान,कभी आरक्षण,कभी आंबेडकर,कभी मनुस्मृति,कभी झोले-झंडे आदि-आदि।इन सबके इर्द-गिर्द ही आपकी राजनीति,देशनीति क्यों घूम रही है। इस देश को इसके अलावा कोई काम नहीं? या आपके पास इसके अलावा कोई काम-मुद्दा नहीं?