पैमाइश के दौरान विवाद की आशंका पहले ही जताने का दावा, पुलिस बल की मांग के बावजूद नहीं टला टकराव; घायल परिजनों के साथ थाने में बैठाए जाने का आरोप

माधौगंज पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल! सुरक्षा मांगी, फिर भी खूनी संघर्ष का आरोप; अब पीड़ित पक्ष पर ही मुकदमा दर्ज होने का दावा

 

पैमाइश के दौरान विवाद की आशंका पहले ही जताने का दावा, पुलिस बल की मांग के बावजूद नहीं टला टकराव; घायल परिजनों के साथ थाने में बैठाए जाने का आरोप

 

#हरदोई 

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जनपद के माधौगंज थाना क्षेत्र में भूमि की पैमाइश के दौरान हुए कथित खूनी संघर्ष ने पुलिस और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़ित दिलीप कुमार यादव का आरोप है कि उन्होंने विपक्षियों से अपनी और अपने परिजनों की जान को खतरा होने की आशंका पहले ही जताई थी। विवाद की संवेदनशीलता को देखते हुए पैमाइश के दौरान पर्याप्त पुलिस बल उपलब्ध कराने की मांग भी की गई थी। इसके बावजूद मौके पर विवाद बढ़ने और मारपीट होने का आरोप सामने आया है।

 

मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया, जब पीड़ित पक्ष ने आरोप लगाया कि घटना के बाद उसकी शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि उलटे उसी पक्ष के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर दिया गया। पीड़ित का यह भी दावा है कि गंभीर रूप से घायल परिजनों के साथ उसे थाने में बैठा लिया गया। यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह केवल एक भूमि विवाद का मामला नहीं रहेगा, बल्कि शिकायतों के निस्तारण, पुलिस की निष्पक्षता और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े अहम सवालों का विषय बन जाएगा।

 

पहले खतरे की आशंका, फिर संघर्ष?आखिर रोकथाम के इंतजाम कहां थे?

 

पीड़ित के अनुसार, भूमि विवाद को लेकर पहले से तनाव बना हुआ था। ऐसे में पैमाइश की कार्रवाई के दौरान किसी अप्रिय घटना की आशंका को नजरअंदाज करना कई सवाल पैदा करता है। यदि वास्तव में संबंधित अधिकारियों को संभावित संघर्ष की जानकारी दी गई थी और पुलिस बल की मांग की गई थी, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि उस मांग पर क्या कार्रवाई की गई? मौके पर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी या नहीं? और यदि तनाव की जानकारी पहले से थी, तो विवाद को बढ़ने से रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए?

 

प्रशासनिक व्यवस्था का उद्देश्य केवल घटना के बाद मुकदमा दर्ज करना नहीं, बल्कि समय रहते संभावित विवाद को रोकना भी है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम में पैमाइश की प्रक्रिया, मौके पर मौजूद अधिकारियों की भूमिका और सुरक्षा व्यवस्था की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

 

पीड़ित की तहरीर पर क्या कार्रवाई हुई, और मुकदमा किस आधार पर दर्ज किया गया?

 

मामले का सबसे संवेदनशील पहलू पीड़ित पक्ष का यह आरोप है कि उसने अपनी शिकायत देकर कार्रवाई की गुहार लगाई, लेकिन कार्रवाई का सामना उसी पक्ष को करना पड़ा। यदि एक पक्ष गंभीर चोटों का दावा कर रहा है और दूसरा पक्ष भी कोई शिकायत लेकर सामने आया है, तो पुलिस की जिम्मेदारी है कि दोनों पक्षों के आरोपों, उपलब्ध साक्ष्यों, मेडिकल रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों की निष्पक्षता से जांच करे।

 

सवाल यह नहीं कि किस पक्ष को पहले सुना गया, बल्कि सवाल यह है कि क्या सभी तथ्यों की जांच करके कानून के मुताबिक कार्रवाई की गई? क्या पीड़ित की तहरीर पर नियमानुसार निर्णय लिया गया? क्या चोटिल लोगों का चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया? और मुकदमा दर्ज करने का आधार क्या रहा?

 

इन सवालों का जवाब संबंधित पुलिस अधिकारियों को तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर स्पष्ट करना चाहिए। किसी भी पक्ष को केवल आरोप के आधार पर दोषी मानना उचित नहीं, लेकिन किसी शिकायत को अनदेखा किए जाने का आरोप भी गंभीरता से जांचा जाना चाहिए।

 

पुलिस कप्तान अशोक कुमार मीणा के नेतृत्व वाली व्यवस्था के सामने निष्पक्षता की कसौटी

 

हरदोई के पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार मीणा के नेतृत्व वाली पुलिस व्यवस्था के सामने अब इस प्रकरण में पारदर्शी कार्रवाई सुनिश्चित करने की चुनौती है। पीड़ित के आरोपों की सच्चाई जांच से ही सामने आएगी, लेकिन ऐसी शिकायतों पर समयबद्ध और निष्पक्ष कार्रवाई जनता के भरोसे के लिए बेहद जरूरी है।

 

यदि किसी व्यक्ति ने पहले ही संभावित हिंसा की आशंका जताकर सुरक्षा मांगी थी, तो उस शिकायत का रिकॉर्ड, उस पर हुई कार्रवाई और मौके की परिस्थितियों की जांच होनी चाहिए। साथ ही, यदि पीड़ित पक्ष के विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ है, तो उसके आधार और उपलब्ध साक्ष्यों की भी समीक्षा की जानी चाहिए।

 

पुलिस की निष्पक्षता केवल कार्रवाई करने में नहीं, बल्कि हर पक्ष के साथ कानून के मुताबिक समान व्यवहार करने में दिखाई देती है। इस मामले में भी जवाबदेही तथ्यों के आधार पर तय होनी चाहिए, न कि किसी पक्ष के प्रभाव या दबाव के आधार पर।

 

✅डीएम और एसपी से प्रमुख मांगें

 

पीड़ित दिलीप कुमार यादव के आरोपों को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन से निम्न बिंदुओं पर कार्रवाई की मांग उठती है_

 

1. पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच कराई जाए।

2. पैमाइश के दौरान पुलिस बल की मांग किए जाने संबंधी प्रार्थना पत्र और उस पर हुई कार्रवाई की जांच हो।

3. पैमाइश में शामिल राजस्व कर्मियों तथा मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों की भूमिका स्पष्ट की जाए।

4. घायल बताए जा रहे लोगों की मेडिकल रिपोर्ट, चोटों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर घटनाक्रम की पुष्टि की जाए।

5. पीड़ित की तहरीर पर हुई कार्रवाई तथा उसके विरुद्ध दर्ज मुकदमे के आधार की समीक्षा की जाए।

6. जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही अथवा पक्षपात सामने आने पर नियमानुसार जवाबदेही तय की जाए।

7. पीड़ित परिवार की सुरक्षा संबंधी आशंका का आकलन कर कानून के अनुसार आवश्यक कदम उठाए जाएं।

अब जवाबदेही से नहीं बच सकते जिम्मेदार अधिकारी!

माधौगंज का यह प्रकरण प्रशासन के सामने एक सीधा सवाल रखता है_यदि संभावित विवाद की सूचना पहले से थी, तो उसे रोकने के लिए क्या किया गया? और यदि घटना के बाद दोनों पक्षों की शिकायतें सामने आईं, तो निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए?

 

इन सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, मेडिकल रिपोर्ट, गवाहों के बयानों और निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए। प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पीड़ित को न्याय की मांग करने के कारण किसी तरह की अनुचित परेशानी न उठानी पड़े और कानून के तहत किसी भी पक्ष के साथ भेदभाव न हो।

 

न्याय की गुहार लगाने वाले को न्याय मिलना चाहिए, अन्याय का एहसास नहीं।

 

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और पुलिस नेतृत्व इस मामले में संज्ञान लेकर सच्चाई सामने लाते हैं या पीड़ित के गंभीर आरोप जवाब की प्रतीक्षा करते रह जाते हैं।

संपादकीय आग्रह: संबंधित पुलिस एवं राजस्व अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही प्रकरण की पूरी स्थिति स्पष्ट होगी। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

✍️ डी डी शुक्ला_हरदोई & स्वतंत्र पत्रकार

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