बुविवि के विद्यार्थियों ने किया गैराहा के प्राचीन शिव मंदिर का अवलोकन

विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष शैक्षणिक भ्रमण�

सीडीओ ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया�

तुलसी की जैविक खेती का तौर तरीका भी समझा

बुनाई की मशीन और प्रविधियां भी समझीं

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झांसी। क्षेत्रीय पर्यटन कार्यालय के ग्रामीण एवं हेरिटेज पर्यटन प्रोजेक्ट के तहत बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान के विद्यार्थियों और शिक्षकों के एक दल ने गैराहा ग्राम पंचायत में स्थित चंदेलकालीन शिव मंदिर का अवलोकन कर अपनी अनूठी ऐतिहासिक धरोहर और उनकी विशिष्टताओं के बारे में जानकारी हासिल की।

आज पूर्वाहन करीब साढ़े नौ बजे झांसी नगर के अटल एकता पार्क के गेट नंबर से बुविवि, झांसी के विद्यार्थियों और शिक्षकों के शैक्षणिक भ्रमण दल के वाहनों को मुख्य विकास अधिकारी रामेश्वर सुधाकर ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस मौके पर उन्होंने विकास में पर्यटन के महत्व को भी रेखांकित किया। क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी डीके शर्मा, शिक्षक डा राघवेन्द्र दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षक उमेश शुक्ल, शोधार्थी अतीत विजय समेत करीब तीस लोगों का जत्था तीन वाहनों से गैराहा पहुंचा। वहां गैराहा ग्राम के लोगों ने शैक्षणिक भ्रमण दल के सदस्यों एवं क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी डीके शर्मा, डा राघवेन्द्र दीक्षित, उमेश शुक्ल आदि का स्वागत किया।

शैक्षणिक भ्रमण दल के सभी सदस्यों ने गैराहा के प्राचीन शिव मंदिर का अवलोकन किया। चालीस से अधिक सीढ़ियां चढ़कर सभी मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचे। चंदेल काल में निर्मित यह मंदिर बलुआ पत्थरों से निर्मित है। इसका वास्तुशिल्प अनूठा है।इस मंदिर का निर्माण मध्यकाल (लगभग 11वीं से 13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध) में परवर्ती चंदेल राजाओं द्वारा करवाया गया था। यह बुंदेलखंड क्षेत्र में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण �द्वारा संरक्षित गिने-चुने और प्रमुख ऐतिहासिक स्मारकों में से एक है। यह मंदिर गैराहा जिसका पुराना नाम गेहराव हैं में एक छोटी पहाड़ी की चोटी पर ऊंचे चबूतरे पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बना हुआ है। वास्तुकला की दृष्टि से यह अनुपम है। मंदिर की संरचना में गर्भगृह, अंतराला और सभा मंडप शामिल हैं। गर्भगृह का प्रवेश द्वार अत्यंत अलंकृत है जो प्राचीन नागर शैली के शास्त्रीय रूपों को दर्शाता है, वहीं सभा मंडप व प्रवेश द्वार पिरामिडनुमा संरचना से सुसज्जित हैं। इस मंदिर के गर्भगृह के द्वार के शीर्ष पर भगवान शिव की प्रतिमा विराजमान है, जिसके दाहिनी ओर ब्रह्मा और बाईं ओर विष्णु (त्रिदेव) के दर्शन होते हैं।�

यह मंदिर लाखों लोगों की आस्था का प्रमुख केद्र है। मंदिर की देखरेख नियमित रूप से पंडित जय प्रकाश पाठक करते हैं। उन्होंने बताया कि हर वर्ष जनवरी में इस मंदिर पर दस दिन का मेला लगता है।�

बाद में शैक्षणिक भ्रमण दल ने गैराहा से पठा करका गांव जाकर वहां के किसानों की तुलसी जैविक खेती की उद्यमिता और उससे जुड़े पहलुओं के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की। पवन कुमार पस्तोर ने बताया कि इस गांव के किसान करीब एक हजार एकड़ में तुलसी की खेती कर रहे हैं। यह खेती किसानों के लिए कारगर साबित हो रही है। श्यामा,रामा और वन तुलसी तीन प्रजातियां इस क्षेत्र में प्रचलित हैं। उन्होंने तुलसी की उपयोगिता के बारे में भी बताया।

बाद में शैक्षणिक भ्रमण को निकला यह दल रानीपुर कस्बे से सटे देवरी सिंह पुरा पंचायत पहुंचा। वहां इस दल ने बुनकर कैलाश चंद्र की पावरलूम इकाई का अवलोकन कर कपड़ा बनाने की प्रक्रिया समझी। इस मौके पर कैलाश चंद्र और सुंदर लाल चंदेरिया, रवि कुमार आदि ने बुनकरों की समस्याओं और उनकी गतिविधियां, व्यवसाय की परिस्थितियों पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि आज भी देवीसिंह पुरा के लोग कपड़ा बुनने के काम में जोर शोर से लगे हैं। वे चादर, गमछा, दरी, तौलिया आदि बनाकर जीविकोपार्जन कर रहे हैं। कभी यहां का टेरीकाट पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध था लेकिन अब उतनी डिमांड नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि लोकल फार वोकल को महत्व मिले तो उनका काम और बढ़ सकता है। इससे पहले इसी गांव के कौशल किशोर महाराज के मंदिर में स्थानीय लोगों ने भजन और कीर्तन का कार्यक्रम पेश किया। यहां के लोगों ने भी शैक्षणिक भ्रमण दल का पूरे मनोयोग से स्वागत किया। विद्यार्थियों ने जलविहार को निकले प्रभु की झांकी का अवलोकन भी किया।

ग्रामीणों ने शैक्षणिक भ्रमण दल को सुखनई नदी, देवरीसिंह पुरा और रानीपुर क्षेत्र का महत्व भी बताया।

अंत में शैक्षणिक भ्रमण दल के सदस्यों ने उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग,क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी डीके शर्मा, उनकी टीम के सदस्यों, आदर्श युवा समिति और ग्रामीणों के प्रति आभार ज्ञापित किया। विद्यार्थियों ने कहा कि इस शैक्षणिक भ्रमण से उन्हें जहां अपनी अनूठी धरोहरों के बारे में जानकारी मिली, वहीं नजदीक से जैविक खेती,उसके तौर तरीकों, उपयोगिता और विकास में उसके महत्व को समझने का मौका मिला। नजदीक से कपड़ा बुनाई की प्रक्रिया को भी समझने का भी सुअवसर मिला। यह शैक्षणिक भ्रमण उनके ज्ञान में वृद्धि करने वाला है।

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