मुस्लिम दलितों के आरक्षण का मुद्दा उठा, पीएम और सीएम को भेजा पांच सूत्रीय ज्ञापन

आलापुर (अंबेडकरनगर)। मुस्लिम दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने और पसमांदा समाज की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग को लेकर राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल ने आवाज बुलंद की है। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष यूथ नूरूल हुदा के नेतृत्व में सोमवार को कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को संबोधित पांच सूत्रीय ज्ञापन एसडीएम आलापुर को सौंपा। इस दौरान नूरूल हुदा ने केंद्र और प्रदेश सरकार के साथ-साथ समाजवादी पार्टी पर भी निशाना साधा। उन्होंने चेतावनी दी कि मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं हुआ तो प्रदेशव्यापी आंदोलन किया जाएगा और दिसंबर में पोल खोल रथ यात्रा निकाली जाएगी।

ज्ञापन सौंपने के बाद पत्रकारों से बातचीत में नूरूल हुदा ने कहा कि 10 अगस्त 1950 को लागू संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश के तहत अनुसूचित जाति के दर्जे पर धार्मिक प्रतिबंध लगा दिया गया था। इसके कारण मुस्लिम और ईसाई दलित जातियां आरक्षण के लाभ से वंचित रह गईं। उन्होंने कहा कि वर्ष 1956 में सिख और 1990 में बौद्ध समुदाय को इस व्यवस्था में शामिल करने के लिए संशोधन किया गया, लेकिन मुस्लिम और ईसाई दलित जातियों को अब तक इसका लाभ नहीं मिला।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल किया कि यदि सरकार पसमांदा समाज के उत्थान को लेकर गंभीर है तो अनुसूचित जाति आदेश से धार्मिक प्रतिबंध हटाने की पहल क्यों नहीं करती? इससे मुस्लिम दलित जातियों को भी संवैधानिक अधिकार मिल सकेगा।
नूरूल हुदा ने बिहार के राजनीतिक घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि अप्रैल 1999 में बिहार विधान परिषद में शकील अहमद खान ने इस मुद्दे को उठाया था। जुलाई 2000 में लालू प्रसाद यादव ने गैर-सरकारी प्रस्ताव पेश किया, जो ध्वनिमत से पारित हुआ। इसके बाद पांच दिसंबर 2000 को राबड़ी देवी सरकार ने अरजाल मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के लिए केंद्र सरकार को सिफारिश भेजी थी।
समाजवादी पार्टी के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण पर सवाल उठाते हुए नूरूल हुदा ने पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव से पसमांदा समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी स्पष्ट करने की मांग की। उन्होंने कहा कि पसमांदा समाज के वोट की अपेक्षा तो की जाती है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के समय इस समाज की अनदेखी होती है।
उन्होंने सवाल किया कि राज्यसभा और लोकसभा में पसमांदा तथा मुस्लिम दलित जातियों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिखाई देता? मुस्लिम समाज की 17 जातियों को अब तक लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलना चिंता का विषय है।
नूरूल हुदा ने कहा, "हम वोट बैंक बने हैं तो अच्छा लगता है, लेकिन राजनीतिक भागीदारी की बात करते हैं तो मिर्ची क्यों लगती है? जिसको वोट देंगे, पहले उसी से हिस्सेदारी मांगने का हक भी रखते हैं।"
उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को अब केवल चुनाव के समय पसमांदा समाज की याद नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसे सत्ता और निर्णय प्रक्रिया में भी उचित स्थान देना होगा। यह आवाज केवल समाजवादी पार्टी, बसपा या कांग्रेस के लिए नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों के लिए है।
उन्होंने अखिलेश यादव को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि समय रहते पसमांदा समाज की राजनीतिक भागीदारी और संवैधानिक अधिकारों पर गंभीर पहल नहीं की गई तो वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में समाज अपना जवाब देगा। उन्होंने कहा कि समाज अब अपने वोट की ताकत और राजनीतिक हिस्सेदारी के महत्व को समझ चुका है।
राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल ने ज्ञापन के माध्यम से पांच मांगें उठाई हैं। इनमें संविधान के अनुच्छेद 341(3) से 10 अगस्त 1950 से लागू धार्मिक प्रतिबंध हटाने, मुस्लिम दलित जातियों के विकास के लिए अरजाल आयोग गठित करने, मुस्लिम पवरिया/पमरिया समेत छूटी हुई जातियों को उत्तर प्रदेश की OBC सूची में शामिल करने, बिहार की तर्ज पर कर्पूरी फार्मूला लागू करने और OBC के 27 प्रतिशत आरक्षण में से 8.44 प्रतिशत कोटा मुस्लिम OBC समुदाय के लिए अलग करने की मांग शामिल है।
नूरूल हुदा ने कहा कि इन मांगों को लेकर संगठन प्रदेशभर में जनजागरण अभियान चलाएगा। यदि सरकार ने मांगों पर ध्यान नहीं दिया तो आंदोलन तेज किया जाएगा और दिसंबर में पोल खोल रथ यात्रा निकालकर समाज के अधिकारों का मुद्दा जनता के बीच उठाया जाएगा।
ज्ञापन सौंपने के दौरान कूमेल अशरफ अंसारी, कल्लू प्रधान, रियाज अंसारी, शहबाज शाह, मुस्तफा नट, शौकत चूड़ीहार, नासिर अंसारी, शोहरत अब्बासी, आसिफ रहमानी, विनोद राजभर, उमेश मल्लाह, रमेश चौहान, सोनी, नियाज गौरी, नबियाज काजी, पिंटू सिंह, अब्दुल्ला अंसारी, फैज अंसारी, शरीफ मंसूरी, शकील सलमानी, दिलशाद सलमानी और मुश्ताक अंसारी समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।