त्रिपुरारी पाण्डेय कि रिपोर्ट/आध्यात्मिक सोच से साहित्य एवं समाज को बदलने की जरूरत* - डॉ. रामबहादुर मिश्र

*आध्यात्मिक सोच से साहित्य एवं समाज को बदलने की जरूरत* - डॉ. रामबहादुर मिश्र

*कबीर, सूर एवं तुलसी का योगदान साहित्य एवं समाज में सर्वाधिक* - डॉ. अर्जुन पाण्डेय

*राहें कठिन है, फिर भी चलना है* - राही राज, बेंगलुरु

बेंगलुरु, 8 जन० 22 अवधी दक्षिण भारत जन-जागरण यात्रा कर्नाटक के कलश कारवां फाउंडेशन (बेंगलुरु) एवं अवध भारती संस्थान (लखनऊ) तथा अवधी साहित्य संस्थान (अमेठी) बेंगलुरु पहुंची। इसी दिन सायं 5 बजे जयराम बिल्डिंग न्यू. के सभागार में तीनों संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में एक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता श्रीमती. अलका राज अग्रवाल (भोपाल) द्वारा किया गया।इस कार्यक्रम में कलश कारवां फाउंडेशन के अध्यक्ष राही राज तथा अवधी साहित्य के पुरोधा डॉ. रामबहादुर मिश्र एवं अवधी साहित्य संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अर्जुन पांडेय की मंच पर उपस्थित उल्लेखनीय रही। इस अवसर पर प्रीति राही ने सरस्वती वंदना करके कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

'सामाजिक परिवर्तन में हिंदी साहित्य की भूमिका' प्रथम सत्र के विमर्श का विषय रहा। विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. अर्जुन पांडेय ने कहा कि साहित्य एवं समाज एक दूसरे के पूरक है। सामाजिक कार्यकर्ता ही सर्वोच्च होता है। कबीर, सूर, तुलसी का योगदान साहित्य एवं समाज निर्माण में सर्वाधिक है। इस अवसर पर डॉ. विनय दास ने अपने संबोधन में राजनीतिक बदलाव में साहित्य की महती भूमिका का उल्लेख किया। डॉ. अरुण कुमार मिश्र ने कहा कि वीरगाथा काल में रची गई चंदबरदाई की रचनाएं आज भी समाज निर्माण में सहायक है। डॉ. बलराम वर्मा ने कहा कि तुलसी के श्रीरामचरितमानस में वर्णित रामराज की जो संकल्पना एवं सपना महात्मा गांधी ने आजादी के बाद भारत के लिए देखा था, उसका आधार मानस ही है। इसी कड़ी में राही राज ने कहा कि राहें कठिन हैं फिर भी चलना है। ज़िन्दगी के दौर में गिर कर संभलना होगा। प्रीति राही ने कहा तू क्यों इतना फिक्र है करता, बदलेंगे तस्वीर और तकदीर देश की। अवध भारती संस्थान के अध्यक्ष डॉ. राम बहादुर मिश्र ने आज के समाज पर बाजारवाद के प्रभाव को घातक बताया। आज हमें भोगवादी संस्कृति से ऊपर उठकर आध्यात्मिक सोच से साहित्य एवं समाज को बदलने की जरुरत है।

दूसरे सत्र में काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। शुरुआत शान्ति मिश्रा गुंजन ने 'नारी का सम्मान चाहिए', लोकेश मिश्र ने 'मौत के बाजार में हो रहा हैं अंगों का व्यापार', विष्णु कुमार शर्मा कुमार ने 'आत्मीयता का विस्तार ही अध्यात्म है', इसी कड़ी में प्रीति राही ने 'न समझो अबला नारी हूं मैं हर बगिया का फूल और फूल वारी हूं मैं' कविता प्रस्तुत किया। सांस्कृतिक संवेदनाओं से वातावरण को उल्लासित करते हुए कर्नल राजेंद्र पांडेय ने विविध लोकगीतों के द्वारा पूरे सभागार को आह्लादित कर दिया। कार्यक्रम का सजीव प्रसारण अवधी बानी चैनल द्वारा किया गया। अंत में संपूर्ण कार्यक्रम का संक्षिप्त एवं सारगर्भित विवरण डॉ. बलराम वर्मा ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए डॉ. शिवम् तिवारी ने कहा कि साहित्य के संवर्द्धन हेतु युवा पीढी को आगे आने की जरुरत है। युवा चेतना ही परिवर्तन का मूल है। 'चलो जिंदगी चले वहां, जहां सुहानी शाम है' के साथ कार्यक्रम सानंद संपन्न हुआ।